जो बाजार की होगी वह हिंदी हमारी होगी
सही है कि हिंदी दिवस को हमने एक बेजान रस्म बना दिया है। यह भी सही है कि इस दिवस
Read Moreसही है कि हिंदी दिवस को हमने एक बेजान रस्म बना दिया है। यह भी सही है कि इस दिवस
Read Moreउबड़खाबड़ खुरदरे चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी-पारदर्शी आंखों में झांकती चंचलता। चंचलता भी ऐसी जिसमें हर वक्त एक अजीब बेचैनी बुनती
Read Moreपिछले दिनों कन्नड़ लेखक प्रो. उर अनंतमूर्ति को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इससे पहले हिंदी के एक कवि को ‘दयावती
Read Moreकृष्णा सोबती ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को चिट्ठी में तो यही लिखा है कि सन् 91-92 का शलाका सम्मान वे
Read More