4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

जो बाजार की होगी वह हिंदी हमारी होगी

सही है कि हिंदी दिवस को हमने एक बेजान रस्म बना दिया है। यह भी सही है कि इस दिवस के पखवाड़े पहले या पखवाड़े बाद तक हिंदी के नाम पर हम कोरा कर्मकांड करते हैं। लेकिन रीति-रिवाज और कर्मकांड हमारे राष्ट्रीय और निजी जीवन में कहाँ नहीं हैं? कबीर और उनके जैसे दूसरे संत कवि कह गए हैं कि जिन्हें बाप की हम कोई देख भाल नहीं करते। मरने पर बहुत रोते हैं और उसके लिए पिंडदान और बड़ा श्राद्ध करते हैं। कोई छूट न जाए इसलिए सर्वपितृ अमावस्या भी है जब सभी पुरखों को निपटाया जा सकता है।

जिस देश में यह सब सदियों से चल रहा है उसमें हिंदी दिवस ही ऐसा अनोखा कैसे हो सकता है कि सब उसे सच्ची भावना और ईमानदार संकल्प के साथ मनाएं? जो लोग भगवान की भक्ति और स्त्री से प्रेम तक को प्रतीकों और रीति-रिवाजों में बाँध सकते हैं वे अपनी मातृभाषा, घर की भाषा और राजभाषा के दिवस को स्वयं स्फूर्त-उत्साह से कैसे भर देंगे? किसी का दिवस तय कर के उसे मनाने के तामझाम करने का मतलब ही यही है कि उसके लिए जो भी विशेष करना हो उसे एक दिन में निपटा दो। फिर उसके लिए साल भर और लगातार कुछ न कुछ करते रहने की जरूरत नहीं रहेगी।

यह अपना स्वभाव है। इस पर अपने आपको कोड़े मारने से न तो यह बदल जाएगा और न अपने को कोड़े मार कर अपराधी महसूस करते रहने की हमारी इच्छा बदल जाएगी। अगर हम चाहते हैं कि दुनिया हमें वैसा ही मंजूर करे जैसे हम हैं तो पहले हमें अपने आप को भी वैसा ही स्वीकार करना होगा जैसे हम हैं। और फिर ज्यादा से ज्यादा सकारात्मक रवैया अपनाने की कोशिश करनी चाहिए।

इस हिंदी दिवस को मनाने का थोड़ा उत्साह इसलिए भी हो सकता है कि एक कन्नड़भाषी और कोई चार महीने पहले कर्नाटक की राजनीति तक सीमित रहे राजनेता ने प्रधानमंत्री होने के बाद हिंदी सीखी और आजादी के पचासवें साल की शुरुआत करते हुए राष्ट्र को उसी भाषा में संबोधित किया जिससे उसने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। यह अब तक के किसी भी प्रधानमंत्री का लाल किले से किया गया हिंदी का सबसे अर्थवान सम्मान है। देवगौड़ा के पहले के ज्यादातर प्रधानमंत्री तो हिंदी इलाके के ही हुए हैं इसलिए उनका स्वतंत्रता दिवस पर हिंदी में बोलना स्वाभाविक था।

मोरारजी देसाई की मातृभाषा गुजराती थी और नरसिंह राव की तेलुगु है। लेकिन यह दोनों ही भूतपूर्व प्रधानमंत्री आजादी की इस लड़ाई के सिपाही थे जिसकी छावनी की भाषा हिंदी थी और इन्होंने जो राजनीति की या करते हैं उसकी भी भाषा हिंदी है। इसलिए इन दोनों का भी लाल किले से पंद्रह अगस्त पर हिंदी में बोलना उतनी बड़ी बात नहीं जितनी कि देवगौड़ा का हिंदी में भाषण पढ़ना था। ऐसा कर के देवगौड़ा ने यह तो फिर बताया ही कि जिस किसी को इस लोकतंत्र में राजनीति करनी हो उसे हिंदी आनी चाहिए। लेकिन यह तो महात्मा गाँधी से लेकर नरसिंह राव तक ने भी किया। शायद इससे भी बड़ी स्थापना देवगौड़ा के हिंदी में भाषण देने से हुई कि इस लोकतंत्र में अब राज भी चलाना हो तो हिंदी आनी जरूरी है। चूँकि आजाद भारत में हिंदी को लेकर सारा झगड़ा और खून-खराबा ही उसके राजभाषा बना दिए के कारण हुआ है। इसलिए दक्षिणी और कन्नड़भाषी प्रधानमंत्री का जनता के साथ कामकाज करने में भी हिंदी को जरूरी मानना उसी इलाके में सबसे पहले और जबरदस्त संदेश पहुँचाना है जहाँ अंग्रेजों का छोड़ा अंग्रेजी प्रभुवर्ग जमा हुआ है और जिसने राजकाज ही नहीं संसद कार्य पर भी अपनी ऐसी पकड़ बना रखी है कि हिंदी सौतन बनी कोप भवन में पड़ी रहे।

अंग्रेजी में काम करने और अंग्रेजी के जरिए इस देश के राजकाज पर अपना प्रभुत्व जमाए रखने वाले लोगों ने देवगौड़ा की इस स्थापना का सबसे मुखर विरोध किया है। उन्हें यह बिल्कुल नागवार गुजरा है कि एक कन्नड़भाषी प्रधानमंत्री यह स्थापित करे कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के बावजूद भारत के प्रधानमंत्री का हिंदी जानना जरूरी है और अगर उसे राष्ट्र को संबोधित करना है तो हिंदी में ही करना होगा। इन लोगों ने देवगौड़ा के भाषा ज्ञान खासकर खराब अंग्रेजी का बहुत मखौल उड़ाया है और ऐसा कहते हुए उन्होंने हिंदी वालों की गैया पट्टी और उसके लोगों को भी बड़ी बदतमीजी से भला-बुरा कहा है। गंवार, अनपढ़, असभ्य और झगड़ालू बताने के बाद आरोप भी लगाया है कि इतने वर्षों से ये हिंदी वाले इस देश पर राज करने की कोशिश कर रहे हैं।

अंग्रेजी वालों का डर और दुख दोनों समझे जा सकते हैं। ये सत्ता जीवी और परदेश जीवी लोग हैं। मुश्किल से तीन लाख लोग अपनी मातृभाषा अंग्रेजी बताते हैं और इन में से भी तीन चौथाई द्विभाषी हैं जो हिंदी जानते हैं। चार प्रतिशत के आसपास लोग अंग्रेजी जानने वाले हैं। अगर इनका वर्चस्व बना हुआ है तो एक तो कोई दो सौ साल के अंग्रेजी राज के कारण और दूसरा राजकाज के ढांचे पर इन लोगों का काबिज होना क्योंकि बावजूद स्वतंत्रता और लोकतंत्र के सरकारी ढांचा वही अंग्रेजों का है जिसे अंग्रेजीदां भारतीय चलाते हैं। हिंदी बोलने वाले पैंतालीस प्रतिशत से ज्यादा हैं और भारत के गैर हिंदी राज्यों में जो भाषा सबसे ज्यादा लोग समझते हैं वह हिंदी ही है। हिंदी से वोट मिल सकता है।

इसलिए जिस दिन राजकाज का ढांचा देसी हुआ और लोकतंत्र में जिस बहुमत की चलनी चाहिए उसकी सचमुच चलने लगी उस दिन अंग्रेजी वालों का राज खत्म हो जाएगा। इस दिन को टालने के लिए अंग्रेजी वाले पिछले पचास साल से वही करते आ रहे हैं जो अपना राज चलाते रहने के लिए अंग्रेज किया करते थे। उन्होंने दूसरी भारतीय भाषाओं को हिंदी के खिलाफ खड़ा किया। अंग्रेजों के सिखाए जिन्ना और खाते-पीते मुसलमानों ने पाकिस्तान क्यों मांगा? क्योंकि वे साधारण मुसलमानों के गले उतार ले गए कि हिंदुस्तान आजाद होगा और यहाँ लोकतंत्र आएगा तो हिंदुओं का राज हो जाएगा। मुसलमान उन हिंदुओं के गुलाम हो जाएंगे जिन्हें कोई हजार साल उन्होंने गुलाम बना के रखा। आजादी और लोकतंत्र के डर ने भारतीय मुसलमानों से उस पाकिस्तान की मांग करवाई जो अंग्रेजों की नीति का नतीजा था।

आजादी के पहले देश में कोई नहीं कहता था कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं होनी चाहिए। बल्कि ज्यादातर गैर हिंदी भाषी नेता ही कहते थे कि अगर इस देश की कोई राष्ट्रभाषा हो सकती है तो हिंदी ही होगी। फिर ऐसा क्यों हुआ कि अंग्रेजों के पाकिस्तान बनाने की तरह अंग्रेजी वाले हिंदी को सौतेली सह राजभाषा बनवाने में सफल हो गए? क्योंकि आजादी के पहले हिंदी मुक्ति की, मेल मिलाप की और सेवा की भाषा थी। वह अंग्रेजों और अंग्रेजी से लड़ने और आजाद होने की भारतीय भाषा थी। आजादी के बाद सत्ता में आए हिंदी वालों ने उसे राजभाषा बनाने की कोशिश की। दूसरी तरफ पंडितों ने उसे बोली और अपनी जड़ों से अलग करके संस्कृत से जोड़ने और अंग्रेजी की अनुवाद भाषा बनाने की कोशिश की ताकि वह अंग्रेजी की जगह ले सके। यह भी कोई डेढ़-दो सौ साल पहले हिंदी और उर्दू कालेज में पढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने ही कलकत्ता में किया था। उन्होंने हिंदी को संस्कृत और उर्दू को फारसी से जोड़ दिया था।

इसके पीछे धारणा यह थी कि सभी भारतीय भाषाएं चूँकि संस्कृत से निकली हैं और उनमें सभी में संस्कृत के या उससे बने शब्द हैं इसलिए हिंदी में जितने ज्यादा संस्कृत शब्द आएंगे उतनी वह शुद्ध और दूसरी भारतीय भाषाओं के लोगों को स्वीकार्य होगी। इस प्रयत्न का भारी भरकम स्मारक आचार्य रघुवीर का वह शब्दकोश है जिसका शब्द-शब्द हिंदी की हंसी उड़ाने के काम आता है। हिंदी के इस संस्कृतिकरण से वह उसके बोलने वालों में ही परायी हो गई और जिन उर्दू वालों के सबसे नजदीक थी उन्हें भी उसे समझना मुश्किल हो गया। राजकाज में जो हिंदी आज भी प्रयोग में आ रही है उसे समझने के लिए हमें अंग्रेजी का मूल पाठ देखना होता है। अंग्रेजी ने ही नहीं सभी विदेशी शासकों ने हमें सिखाया है कि शासक और शासित की भाषा अलग होनी चाहिए। शासन करने वाले हिंदी के लोगों ने ही हिंदी को लोकभाषा नहीं रहने दिया। इन्हीं लोगों ने हिंदी का राजनीति में वही इस्तेमाल किया जो अंग्रेज और अंग्रेजी वाले तो कर ही रहे थे दूसरी भारतीय भाषाओं वाले भी अंग्रेजीवालों के उकसाने पर कर रहे थे। हिंदी को राजनीति करने का औजार बनाने में हिंदी वाले अंग्रेजी और दूसरी भारतीय भाषाओं वाले से पीछे नहीं रहे हैं।

हिंदी को राजकाज की ओर सभी भारतीय भाषाओं के निकट होने वाली भाषा बनाने वालों ने हिंदी की वह लोकोन्मुखी और ऐतिहासिक भूमिका ही बदल दी जिससे वह देश के आम लोगों और उनकी स्वतंत्रता की भाषा के रूप में कोई सात-आठ सदी से विकसित हुई थी। वह भले ही लोकतांत्रिक राज्य की भाषा बनाई गई हो, बनाई गई तो राजभाषा और इसलिए सबसे पहले अंग्रेजी वालों और फिर उकसाने पर दूसरी भारतीय भाषाओं वालों के विरोध का विषय बनी। आजाद भारत में हिंदी अगर राष्ट्रभाषा के पद से उतर कर अंग्रेजी की सौत बन गई तो इसका एक सबसे बड़ा कारण यही है कि हम हिंदी वालों ने स्वतंत्र भारत में हिंदी की सबको समेटने और सबको मिलाने वाली भाषा की भूमिका को विस्तार देने के बजाय उसे राज की भाषा बनाने और राजनीति की काटने वाली भाषाई तलवार बनाया या बनने दिया। अगर हम सभी भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलते और उन्हें अपनी चेरी होने की शंका भी नहीं होने देते तो अंग्रेजी वालों की भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ा देने की चाल कामयाब नहीं होती।

अंग्रेजी के प्रभुवर्ग और हिंदी के प्रभुवर्ग के सत्ता संघर्ष में इस्तेमाल किए जाने से हिंदी का जितना नुकसान हुआ है उतना अंग्रेजी का नहीं हुआ। हिंदी लोकभाषा होकर राष्ट्रभाषा और इसलिए राजभाषा हो सकती थी। अंग्रेजी शुरू से ही इस देश में राज करने वालों की भाषा रही है। लोकभाषा वह कभी हो ही नहीं सकती थी न राष्ट्रभाषा। अंग्रेजी को सिर्फ अपनी भूमिका आगे बढ़ानी थी। हिंदी को नई परिस्थिति में अपनी ऐतिहासिक भूमिका को विकसित करना था। हिंदी वालों ने मेहनत, सेवा, त्याग और तपस्या का कठिन और लंबा रास्ता छोड़कर राजभाषा की संकरी पगडंडी पकड़ ली। नतीजा सामने है। अंग्रेजी और अंग्रेजीवालों का दबदबा, रुतबा और ठसका पिछले पचास साल में इतना बढ़ गया है कि अर्थव्यवस्था में हम जितने गुलाम हो गए हैं उससे ज्यादा दिमाग और संस्कार से गुलामी में पहुँच गए हैं। अंग्रेजी हटाने चले थे खुद हाशिये पर पहुँच गए।

सन् इक्यानवे से देश में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था स्वीकार करने और उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर दौर में आने के बाद से विदेशी पूँजी, विदेशी तकनीकी और विदेशी कंपनियों की अनिवार्यता मान लेने ने अंग्रेजी और अंग्रेजियत को नई मान्यता बल्कि आवश्यकता दिला दी है। यों भी देसी राज में अंग्रेजीवालों के वर्चस्व के कारण हिंदी के हाल बुरे थे। अब तो हालत आजादी के पहले से भी बदतर हो गई है। क्योंकि तब अर्थव्यवस्था में उतने भारतीय लोग नहीं थे जितने अब आ गए हैं। सब टाई बांधे, पर्सनल कंप्यूटर लिए अंग्रेजी में हकलाते हुए दौड़े चले आ रहे हैं।

ऐसे में आशा का एक दिया उस दिन देवेगौड़ा ने जलाया। रूपर्ट मरडॉर्क आ के कह गए कि वे चैनल चलाएंगे तो हिंदी में। माइकल जेक्सन को नमस्ते कर के हिंदी में कहना पड़ा-मैं हिंदुस्तान आ रहा हूँ। और कोई भी बहुराष्ट्रीय कंपनी अपना विज्ञापन हिंदी में किए बिना काम नहीं चला सकती। जो हिंदी राष्ट्रभाषा बन के नहीं चल सकी क्या वह बाजार भी भाषा बन कर जी जाएगी? और वह हिंदी क्या हमारी हिंदी होगी?