विश्व मंच पर हिंदी
चार अक्टूबर, 1988 को तथा इसके बाद पुनः 6 अक्टूबर, 1989 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में हमारे तत्कालीन विदेश मंत्री तथा बाद में प्रधानमंत्री बने पी. वी. नरसिंह राव ने हिंदी में अपना भाषण देकर देश में काफी वाहवाही लूटी थी। हमारे एक राष्ट्रीय दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ ने इस घटना को ‘दशाब्दी का अचम्भा’ बतलाया था। जिस देश के अधिसंख्य राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी तथा बुद्धिजीवी उस विदेशी भाषा का दामन थामे रहें, जो हमारी गुलामी का प्रतीक है, वहाँ का विदेश मंत्री यदि संयुक्त राष्ट्र महासभा में जाकर अपने देश की भाषा में अपनी बात कहे तो वह अचम्भा ही कहा जायेगा।
ऐसा ही एक ‘अचम्भा’ इस घटना से लगभग दस वर्ष पूर्व 1977-78 के दौरान तत्कालीन जनता सरकार के विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। उस समय उन्होंने भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिन्दी में ही अपनी बात कही थी। इन अपवादों को छोड़कर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिंदी के प्रयोग के लिए भी कोई ठोस प्रयत्न नहीं किये गये। सामान्य रूप में सभी राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारतीयों के द्वारा हिंदी का प्रयोग आम बात होनी चाहिए थी। अन्य देशों के जननेता अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बड़े गर्व के साथ अपनी भाषा में अपनी बात कहते हैं। इसके विपरीत हमारे जननेताओं को गुलामी की प्रतीक अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करने में गर्व महसूस होता है और अपने देश की भाषा का प्रयोग करने में हीनता का बोध होता है।
यह हमारे लिए लज्जाजनक स्थिति है, जिसे हम स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही लगातार ढोते आ रहे हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो आज हिंदी भी संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता प्राप्त भाषा होती। जब कभी संयुक्त राष्ट्र संघ में इसके लिए आवेदन-पत्र देने और प्रयत्न करने की बात उठती है तो यह कहकर टाल दिया जाता है कि इसके लिए हमारे देश को डेढ़ करोड़ रुपये प्रतिवर्ष व्यय करने पड़ेंगे। धनराशि की अल्पता को देखते हुए यह दलील बड़ी बचकानी लगती है। बोलने वालों की संख्या तथा भाषा की पूर्णता की दृष्टि से हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने के लिए पूर्णतः सक्षम है। आवश्यकता केवल हमारे अपने निर्णय लेने की है और उसके अनुरूप प्रयत्न करने की है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के समय उसके प्रशासनिक कार्यों के लिए पांच भाषाएं स्वीकृति की गयी थी-अंग्रेजी, रूसी, चीनी, फ्रेंच और स्पेनिश। स्पष्ट ही इन भाषाओं की स्वीकृति के पीछे संघ के प्रारंभिक सदस्यों, विशेषतः स्थायी सदस्यों का प्रभाव काम कर रहा था।
बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिन्दी भाषा का विश्व में तीसरा स्थान है। पहला स्थान चीनी भाषा को प्राप्त है, दूसरा अंग्रेजी और तीसरा हिंदी को। इस दृष्टि से संयुक्त राष्ट्र संघ की शेष भाषाएं हिन्दी से काफी पीछे हैं। इस तथ्य के बावजूद संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को स्वीकृति देने की संभावना कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आती।
देश के अतिरिक्त विदेशों में भी हिन्दी का पर्याप्त प्रसार है। इस समय भारत मूल के लाखों व्यक्ति विदेशों में रह रहे हैं-मुख्यतः श्रीलंका, मलेशिया, मारीशस, गयाना, त्रिनिदाद और टोबागो, बर्मा, फिजी, केनिया, सूरीनाम, सिंगापुर तथा तंजानिया में। इनमें से अधिकांश व्यक्ति उत्तरी भारत के हैं। इसलिए वे वहाँ पर अपनी बोलचाल में अधिकांशतः हिन्दी का प्रयोग करते हैं। विश्व के अन्य अनेक देशों में भी हिन्दी के प्रति पर्याप्त रूचि है। इस समय विश्व के एक सौ पच्चीस से भी अधिक विश्वविद्यालयों तथा संस्थाओं में हिन्दी के अध्यापन की अच्छी व्यवस्था है। इन संस्थाओं में से अनेक में न केवल हिन्दी के अध्ययन और अध्यापन की ही, बल्कि हिन्दी तथा उसकी विभिन्न बोलियों के शोध की भी बहुत अच्छी व्यवस्था है। हिन्दी साहित्य पर शोध कार्य में अमरीका के दस तथा पं. जर्मनी के छः विश्वविद्यालयों ने विशेष लोकप्रियता प्राप्त की है। हिन्दी की प्रसिद्ध पुस्तकों का अनुवाद तो प्रायः होता ही रहता है। कनाडा में पाँच तथा अमरीका में 35 शिक्षण संस्थाओं में हिन्दी के अध्ययन और अध्यापन की सुविधा उपलब्ध है। इसी प्रकार श्रीलंका, बर्मा, नेपाल, जापान, मारीशस और भूटान जैसे पड़ोसी देशों के अतिरिक्त दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका, इटली तथा इंग्लैंड जैसे दूर दराज देशों में भी हिन्दी के प्रति जनरूचि निरन्तर वृद्धि पर है और वहाँ हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए काफी कार्य हो रहे हैं। समिति विदेशों में हिन्दी की परीक्षाएं भी आयोजित करती है, जिनमें अब तक लगभग 40-50 हजार छात्र-छात्राएं सम्मिलित हो चुके हैं।
यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय जगत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अभी काफी कुछ किया जाना शेष हैं और वर्तमान स्थिति को संतोषजनक कहना गलत होगा, फिर भी यह निश्चित है कि हिन्दी भाषी व्यक्तियों की संख्या के आधार पर हम विश्वासपूर्वक संयुक्त राष्ट्र संघ से हिन्दी को प्रशासनिक कार्यों के लिए स्वीकृति देने की मांग कर सकते हैं।
अपनी मांग को मजबूत बनाने तथा हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ाने की दृष्टि से यह भी आवश्यक है कि हम अपने स्वयं के घर को भी टटोलें। भारतीय संविधान ने स्पष्ट शब्दों में हिन्दी को ही राजभाषा घोषित किया है। संविधान के अनुसार अंग्रेजी केवल सह राजभाषा है। मगर व्यावहारिक स्थिति यह है कि सह-राजभाषा अंग्रेजी का सर्वत्र दबदबा है और हिन्दी कहीं-कहीं दबी-छुपी सी नजर आती है।
जर्मनी, जापान, रूस, चीन तथा अन्य सभी देशों ने अपनी तरक्की अपनी ही भाषा के बलबूते पर की है। लेकिन हम, स्वतंत्रता प्राप्ति के लम्बे अरसे बाद भी गुलामी की प्रतीक एक विदेशी भाषा को गले लगाये फिर रहे हैं और उसमें किसी प्रकार की लज्जा अनुभव नहीं करते। हमारे तथाकथित कुलीन वर्ग के लोगों में हिन्दी के प्रति हीनता के भाव बड़ी गहराई से पैठ गए हैं। अंग्रेजी स्कूल, अंग्रेजी भाषा तथा अंग्रेजी रहन-सहन में ही वे अपने स्तर को तलाशते हैं।
लेखक- योगेश चन्द्र शर्मा




