4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

भाषाओं के संकट का दौर

भारतीय भाषाओं, और खासकर हिंदी की लड़ाई इन दिनों अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। वे व्यक्ति, उपक्रम और संस्थान धीरे-धीरे हाशिए पर चले आए हैं जिनके बीच और जिनकी मार्फत ये भाषाएं फल-फूल रही थीं। खतरनाक बात यह नहीं है कि वे सारे आंदोलन दम तोड़ चुके, जो भारतीय भाषाओं की अस्मिता के प्रति संवेदनशील थे, खतरनाक यह है कि ये भाषाएं एकाएक अपने-आपको उस चौतरफा हमले के बीच असहाय पा रही हैं जिसका लक्ष्य देशी भाषाओं को उखाड़ कर अंग्रेजी की अधिनायकवादी स्थिति नए सिरे से बहाल करना है। आज ऐसे अच्छे स्कूल नहीं बचे हैं जहाँ पढ़ाई का माध्यम हिंदी या दूसरी देशी भाषा हों। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ऐसे संस्थान गढ़े नहीं जा सके हैं जहाँ अंग्रेजी को अपदस्थ कर भारतीय भाषाएं शिक्षा और प्रशिक्षण का माध्यम बन सकें। प्रबंधन और प्रशासन के साथ-साथ खुले बाजार में अंग्रेजी की अपरिहार्यता बताती है कि उसका किला अभेद्य होता जा रहा है।

कई लोग यह सवाल पूछते हैं कि इस किले को भेदने में इतनी दिलचस्पी क्यों? अगर देश के ज्यादातर लोग अंग्रेजी को अपनी शिक्षा का माध्यम चुन रहे हैं तो इतनी हाय-तौबा मचाने की आवश्यकता क्या है? या फिर हिंदी का रूप बदल रहा है और उसमें अंग्रेजी के कई प्रचलित शब्द दाखिल हो रहे हैं तो यह तो अनिवार्य प्रक्रिया है जो दुनिया भर में चल रही है। इसमें आज हिंदी के शुद्धतावादी विलाप की जरूरत और उसके मायने क्या हैं?

ये सारे सवाल इस मायने में बहुत इकहरे सवाल हैं कि उनमें भाषा की भूमिका को बहुत सीमित कर दिया गया है। उसे महज अभिव्यक्ति या शिक्षा के ऐसे माध्यम की तरह देखा जा रहा है जो अपने चरित्र में बहुत निरपेक्ष है और जो अपनी बात पहुँचा देने के बाद लुप्त हो जाता है। जबकि कोई भी माध्यम निरपेक्ष नहीं होता। वह अपने चरित्र से परावर्तन की प्रक्रिया को प्रभावित कर चीजों को एक नई शक्ल और स्थिति में पेश करता है। पानी या हवा के माध्यम से जिन चीजों को हम देखते हैं उनका आकार और उनकी जगह बदली हुई पाते हैं। जबकि भाषा महज माध्यम होती भी नहीं। वह हवा या पानी नहीं होती, पूरा वातावरण होती है जिसमें हमारा रंग-रूप और स्वभाव निर्धारित होता है। भाषा की इस महती भूमिका पर विचार करें तो पाएंगे कि हम ही भाषाओं को नहीं गढ़ते, भाषाएं भी हमें गढ़ती हैं। भाषा की मार्फत ही हम संस्कृति और विचार की उस बड़ी दुनिया में दाखिल होते हैं जहाँ स्मृतियाँ, स्वप्न और चिंताएं हमें घेरती हैं। जहाँ रिश्ते-नातों से होकर देश और समाज तक से हमारी पहचान पुख्ता होती है।

मगर भाषा से हमारा कटाव बढ़ा है और नतीजतन संस्कृति और विचार की एक बड़ी दुनिया का दरवाजा हमारे लिए बंद हुआ है। स्मृति, स्वप्न और चिंताएं हमारे लिए बेमानी हैं, और देश तथा समाज से पहचान एक अप्रासंगिक मुद्दा है। इस स्थिति के लिए एक साथ कई चीजें जिम्मेदार हैं। भाषा को सबसे ज्यादा नुकसान शुद्धतावादी आग्रहों ने ही पहुँचाया है। चूँकि भाषा के साथ-साथ संस्कृति के प्रश्नों को भी बहुत संकरे परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाता रहा है इसलिए भाषा सबसे ज्यादा अपने हिमायतियों के दुराग्रह का शिकार हुई है। संस्कृति एक निरंतर विकासमान प्रक्रिया है, वह अपने बाहरी स्वरूप से कहीं ज्यादा एक मानसिक स्थिति है। मगर संस्कृति को हमारे यहाँ एक जड़ मुद्दा बना दिया जाता है। नतीजे में भाषा भी जड़ हुई है। भाषा पर दूसरा दबाव बाजार का पड़ा है। शिक्षा, नौकरी, उद्योग-हर क्षेत्र में अंग्रेजी की बढ़ती मांग ने सहज रूप से भारतीय भाषाओं को दोयम दर्जे की हैसियत दे डाली है। भारतीय मेधा इस नई प्रवृत्ति के कारण अंग्रेजी के अधकचरेपन से मात खा रही है। प्रशासन और प्रबंधन के उच्चस्थ पदों पर बैठे अंग्रेजीदां लोगों ने इस स्थिति को और दुरूह बना दिया है।

आज का एक लोकप्रिय सवाल यह भी है कि अगर भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक धारा में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है तो इसमें हर्ज क्या है? क्या पश्चिम और अंग्रेजी भाषा के प्रति कोई ‘सिनिकल’ दृष्टि हमारे सहज विकास को बाधित नहीं कर रही? यहाँ यह समझना आवश्यक है कि एक भाषा के तौर पर अंग्रेजी से हमारा कोई बैर नहीं है। मगर खतरा तब खड़ा होता है जब वह एक खास वर्ग की प्रतिनिधि बन कर आती है और शेष समुदाय का शोषण करना अपना अधिकार समझती है। भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के इस मसले को डा. राम मनोहर लोहिया ने बहुत बारीकी से पकड़ा था। उन्होंने कहा था, ‘अंग्रेजी हिंदुस्तान को ज्यादा नुकसान इसलिए नहीं पहुँचा रही है कि वह विदेशी है बल्कि इसलिए कि भारतीय प्रसंग में वह सामंती है। आबादी का सिर्फ एक प्रतिशत छोटा-सा अल्पमत ही अंग्रेजी में ऐसी योग्यता हासिल कर पाता है कि वह उसे सत्ता या स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है। इस छोटे से अल्पमत के हाथ में विशाल जन समुदाय पर अधिकार और शोषण करने का हथियार है अंग्रेजी।’ भाषा के इस पेंच को लोहिया ने खूब समझा था। उनकी दो बहुत साफ मान्यताएं थीं। वह मानते थे कि जब तक अंग्रेजी बनी हुई है, तब तक हिंदी और शेष भारतीय भाषाओं के बीच संवाद की स्थिति नहीं बनेगी। अंग्रेजी जिस दिन जाएगी उस दिन भारतीय भाषाओं का आपसी झगड़ा खत्म हो जाएगा। दूसरे, वह मानते थे कि भाषा इस्तेमाल से मंजती है। जितना हम हिंदी का इस्तेमाल करेंगे, उतना ही वह मजेगी।

मगर दुर्भाग्य से अंग्रेजी आज हटने की जगह ज्यादा मजबूत हुई है और हिंदी का इस्तेमाल निरंतर कम हुआ है। शुरू के दौर में भारतीय भाषाओं को उनकी हैसियत दिलाने के लिए समाजवादी दलों की ओर से कुछ पहल देखने को मिली थी, मगर लोहिया के वारिसों ने जो सलूक लोहिया के साथ किया वही हिंदी प्रेमियों ने हिंदी के साथ किया। आज किसी भी दल के घोषणा पत्र में भाषा का मुद्दा दूर-दूर तक नजर नहीं आता। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा उछाल रही भारतीय जनता पार्टी भी भाषा का सवाल खड़ा नहीं करती। जबकि भाषा ही राष्ट्र और संस्कृति की सरहदें तय करने का मुख्य माध्यम है।

अंग्रेजी की वर्चस्ववादी स्थिति ने कई लोकप्रिय भ्रम भी खड़े किए हैं। पहला भ्रम यह है कि अंग्रेजी छोड़ने के बाद हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पिछड़ जाएंगे। जबकि स्थिति यह है कि इन क्षेत्रों में पिछड़े हुए तो हम इसलिए हैं कि अंग्रेजी को माध्यम बनाए हुए हैं। दुनिया का इतिहास बताता है कि उन्हीं देशों ने इन क्षेत्रों में ज्यादा तरक्की की है जिन्होंने अपनी भाषा में विज्ञान और प्रौद्योगिकी गढ़ी और पढ़ी। सोवियत संघ, चीन, फ्रांस और जर्मनी का विकास उनकी अपनी भाषाओं के जरिए हुआ। खुद ब्रिटेन को भी पाँच सौ साल पहले अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए फ्रेंच के आतंक से मुक्त होना पड़ा। हाल में फ्रांस की सरकार को निर्देश जारी करना पड़ा कि वहाँ अंग्रेजी के शब्दों का प्रचलन खत्म किया जाए। क्योंकि भाषा की भूमिका को अंग्रेजों ने पहले से भुगता और समझा हुआ था, इसलिए उन्होंने एक भारतीय वर्ग को अंग्रेजीदां बनाया और उसके हाथों में सत्ता सौंप कर अपने साम्राज्यवाद को ज्यादा स्थायी शक्ल दी।

अब यह सत्तासीन और सत्ता से निकलने वाले अन्य लाभ लेने वाले वर्ग देश को कई तरह से अंग्रेजी की अपरिहार्यता का पाठ पढ़ा रहा है। एक दिलचस्प और हास्यास्पद तर्क यह दिया जाता है कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा है और इसलिए हमें इसका इस्तेमाल करना चाहिए। पहली बात तो यह कि अंग्रेजी का यह दावा ही संदेहास्पद है। फिर भी यह मान लिया जाए कि वह दुनिया के सबसे बड़े हिस्से में बोली जाती है, तब भी क्या फर्क पड़ता है। हमारे देश की पचानवे प्रतिशत जनता इसी देश की सरहद में मर-खप जाती है। उसे बाहर जाने का अवसर तक भी नहीं मिलता। फिर भी इस तर्क का प्रसार इस तरह किया जा रहा है मानो यह आम आदमी के लिए कोई अपरिहार्य सी स्थिति है। ध्यान दें तो एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर देशों में यूरोपीय भाषाएं अलग-अलग बहानों से यूरोप के साम्राज्यवाद को बचाए रखने की कोशिशों में संलग्न हैं। भारत की स्थिति भी भिन्न नहीं है और यहाँ अंग्रेजी वही काम कर रही है।

अब हो यह रहा है कि अंग्रेजी भारतीय भाषाओं को बोलियों में बदल रही है और औसत हिंदीभाषी नागरिक दोयम दर्जे की नागरिकता के लिए अभिशप्त बना हुआ है। संचार माध्यमों ने हिंदी को भी बोली बना डाला है, जिसका मकसद सिर्फ अपनी बात पहुँचा भर देना है। संप्रेषणीयता जरूरी नहीं है, बोधगम्यता पर्याप्त मानी जा रही है। भारतीय भाषाओं में ललित साहित्य तो है, मगर इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, गणित और प्रौद्योगिकी की किताबें सिरे से गायब हैं। इस दिशा में जो सरकारी उपक्रम हो रहे हैं वे आशा कम और जुगुप्सा ज्यादा करते हैं। वहाँ से ऐसी हिंदी सामने आ रही है जिसका अपनी परंपराओं, अपने मुहावरों और अपनी जीवंतता से कोई वास्ता नहीं है। यह एक बेजान और सपाट हिंदी है। भ्रम यह बन रहा है कि हिंदी ऐसी ही है। शब्दकोश निर्माण का काम भी हमारे यहाँ यांत्रिक और सरकारी ढंग से निपटाया जा रहा है। हिंदी अनुवाद की भाषा बनती जा रही है। इस बात की परवाह किसी को नहीं है कि इन शब्दकोशों में भारतीय भाषाओं की एक जीवंत परंपरा प्रतिबिंबित हो।

इन सारी चीजों के नतीजे भारतीय भाषाओं से जुड़ा बहुत बड़ा वर्ग भुगत रहा है। उसे अपनी तमाम मेधा के बाद भी एक छोटे से अंग्रेजीदां वर्ग का मातहत होना पड़ रहा है। दूसरी तरफ देश, संस्कृति और समाज के सवाल हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न या तो पुनरूत्थानवादी शक्तियों का नारा बना हुआ है, या फिर बाजारवादी ताकतों के हाथ में खिलौना बना हुआ है। राष्ट्र के सामूहिक और जमीनी विकास की कोई ठोस प्रेरणा और दिशा न हासिल है और न ही वांछित है। अंग्रेजी ने हमें आपस में लड़ते अलग-अलग समूहों में बदल डाला है जिनके पास कोई सामूहिक लक्ष्य नहीं रह गया है। भारतीय भाषाओं को इस दोयम दर्जे की हैसियत से निजात कैसे मिलेगी, यह प्रश्न बचा हुआ है।

लेखक- प्रियदर्शन