William Shakespeare birthday

23 अप्रैल क्यों है खास? — शेक्सपियर के 462वें जन्मदिन पर साहित्य की नई शुरुआत

यहाँ तक कि त्रासदियों में, जहाँ औरतें अक्सर पीड़ित होती हैं- शेक्सपियर अपनी औरतों को आन्तरिकता की गरिमा देता है। ओफीलिया दुखद है इसलिए नहीं कि वह कमजोर है, बल्कि इसलिए कि उसके आसपास की व्यवस्थाएं — उसके पिता, उसका भाई, हैमलेट, दरबार — लगातार उसे कुछ भी होने की जगह नहीं देतीं। डेस्डेमोना का…


यहाँ तक कि त्रासदियों में, जहाँ औरतें अक्सर पीड़ित होती हैं- शेक्सपियर अपनी औरतों को आन्तरिकता की गरिमा देता है। ओफीलिया दुखद है इसलिए नहीं कि वह कमजोर है, बल्कि इसलिए कि उसके आसपास की व्यवस्थाएं — उसके पिता, उसका भाई, हैमलेट, दरबार — लगातार उसे कुछ भी होने की जगह नहीं देतीं। डेस्डेमोना का सद्गुण भोलापन नहीं है; यह एक विशिष्ट नैतिक प्रतिबद्धता है जिसे नाटक हमसे गम्भीरता से लेने को कहता है। शेक्सपियर में औरतें, चरित्र की गम्भीरता की परवाह किए बिना, पुरुषों के समान, यदि अधिक नहीं तो, जटिल हैं, और सजा, यदि आती है, तो संरचनात्मक है, एक कहीं अधिक परिष्कृत नारीवादी अवलोकन है जो कई आधुनिक मंच [पाठ] कर पाने में असफल रहते हैं। यह न भूलें,ये सभी पात्र उस समय लिखे गए थे जब महिलाओं को मंच पर प्रदर्शन करने की अनुमति भी नहीं थी। हर पोर्शिया,‌हर बीट्रिस, हर रोजालिंड, हर लेडी मैकबेथ– मूल रूप से एक लड़के द्वारा निभाई गई थी। शेक्सपियर के काम में महिला शक्ति मंच पर वास्तविक महिलाओं की लगभग पूर्णरूपेण अनुपस्थिति में लिखी गई थी,जो संयोग नहीं बल्कि आश्चर्यजनक है।

भारतीय कक्षा और विशिष्ट दांव: अब इसे 2026 के शहरी भारत में रखें। पोर्शिया से पहली बार 8वीं कक्षा की छात्रा, सांख्यिकीय रूप से, किसी शहर — मुम्बई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, कलकत्ता — में होने की सम्भावना है। वह शायद ऐसे परिवारों से हैं, जहाँ माता-पिता दोनों काम करते हैं, जहाँ स्मार्टफोन मानक हैं, जहाँ इंस्टाग्राम और यूट्यूब 9 या 10 वर्ष की उम्र से ही कथा सम्बन्धी अपेक्षाएं गढ़ रहे हैं। उन्होंने बालीवुड फिल्में देखी हैं जहाँ, भारी और वास्तविक लाभ के बावजूद, सार्वजनिक जीवन में महिलाएं अभी भी नियमित रूप से कमतर आंकी जाती हैं — राजनीति में, न्यूजरूम में, कोर्टरूम में, स्टार्टअप में — हर जगह। और फिर वे पोर्शिया से मिलती हैं,जो कोर्टरूम में चलकर आती हैं और बाकी सबको मात दे देती हैं।

ज्यादातर सीबीएसई और आईसीएसई छात्रों द्वारा विलियम शेक्सपियर के माध्यम से जो पाठ्यक्रम यात्रा की जाती है, वह सावधानी से नक्शा बनाने लायक है। छात्र ‘द मर्चेंट आफ वेनिस ‘ अब ‘जूलियस सीजर’ की ओर बढ़ते हैं, जहाँ पोर्शिया — एक अलग पोर्शिया ब्रूटस की पोर्शिया– एक संक्षिप्त पर तीखे दृश्य में प्रकट होती है जिसमें वह माँग करती है कि उसका पति उसे एक समान साथी माने। “मैं मानती हूँ कि मैं एक औरत हूँ, पर साथ ही/एक ऐसी औरत जिसे लार्ड ब्रूटस ने पत्नी बनाया। ” यह पंक्ति 16 शब्दों की है, और इसमें घरेलू विश्वास की राजनीति के बारे में एक पूरा तर्क समाया है। फिर उच्च विद्यालय के अन्तिम वर्षों में मैकबेथ आता है, जहाँ ‘लेडी मैकबेथ’ एक गड़गड़ाती बिजली की तरह आती है, इतनी शक्तिशाली कि अपने पति को तुलनात्मक रूप से मिमियाती बिल्ली जैसा बना देती है। यह, चाहे डिजाइन से हो या दुर्घटना से, उल्लेखनीय नारीवादी पाठ्यक्रम है। छात्रा एक ऐसी औरत से शुरू करती है जो अपने सामाजिक-राजनीतिक ज्ञान और बुद्धि के जरिए समाज पर जीत हासिल करती है। वह एक ऐसी औरत की ओर बढ़ती है जो अपने पति के राजनीतिक और घरेलू जीवन में शामिल होने की माँग करती है, एक विशेषाधिकार के रूप में नहीं बल्कि एक अधिकार के रूप में। वह अन्ततः एक ऐसी औरत तक पहुँचती है जो सीधे अपनी शक्ति तक पहुँचती है और अन्त में उससे नष्ट हो जाती है — इस तरह नष्ट होती है जो जवाबों से ज्यादा प्रश्न उठाती है।

कक्षा में शिक्षक: शेक्सपियर की महिला केन्द्रीयता के प्रति प्रतिबद्धता व्यवस्थित है। यह उनके पूरे काम में चलती है, और यह निरन्तरता विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह शैलियों में फैली हुई है। बोर्ड की हास्य-नाटकों ने हमें शानदार, हाजिरजवाब औरतें दी हैं जो रोमांटिक कथानकों को चलाती हैं। उनकी त्रासदियों ने हमें भारी नैतिक और मनोवैज्ञानिक गहराई वाली औरतें दिखाईं हैं, और उनके इतिहास, उनके सबसे पुरुष-प्रधान रूप, ने हमें किंग जोन में कॉन्स्टेंट या हेनरी पंचम में फ्रेंच प्रिंसेस कैथरीन जैसी आवाजें दी हैं; ऐसी औरतें जो, बहुत कम मंच समय में, खुद को फर्नीचर से ज्यादा स्थापित करती हैं। यहाँ तक कि उनके देर के रोमांस, जिन्हें कभी-कभी कमतर काम के रूप में खारिज कर दिया जाता है, हमें पेरिक्लीज में मरीना, ‘द विंटर्स टेल’ में पर्डिटा, और ‘द टेम्पेस्ट’ में मिरांडा देते हैं — युवा औरतें जो निष्क्रिय हुए बिना सद्गुण और फीकी हुई अच्छाई का प्रतीक हैं।

एक कक्षा में जो अपने छात्रों से चाहती है कि वे अपने शेक्सपियर को गम्भीरता से लें, एक पाठ खुद नहीं पढ़ाता। ‘द मर्चेंट आफ वेनिस’ का कोर्ट दृश्य इस तरह से पढ़ाया जा सकता है कि पोर्शिया को पूरी तरह से उपकरण बना दिया जाए — एक प्लाट डिवाइस जो एंटोनियों की समस्या हल करती है — या इसे इस तरह पढ़ाया जाता है कि छात्रों से कहा जाए कि वे बैठें और देखें कि महिला वास्तव में क्या करती है और कैसे करती है ? वास्तव में उन दो तरीकों के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। पहले में, छात्र एक व्यापारी और एक साहूकार के बारे में एक कहानी लेकर जाते हैं, और दूसरे में एक सवाल लेकर जाते हैं: जब कोई जिसे व्यवस्थित रूप से कम आँका गया है, एक कमरे में चलकर आता है और उसे बिना किसी के सचमुच समझे टुकड़े-टुकड़े कर देता है, तो वह कैसा दिखता है ? क्या हम किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं ? क्या हम ऐसे हो सकते हैं ?

शहरी भारतीय अंग्रेजी शिक्षक — और विशेष रूप से उनमें महिलाएं, जो विद्यालय स्तर पर एक महत्त्वपूर्ण बहुमत हैं — यहाँ एक अनूठी स्थिति में हैं। उनमें से कई एक समान पाठ्यक्रम से गुजरी है, कई शेक्सपियर की औरतों से तब मिलीं जब वे खुद (स्वत:) किशोरी थीं।‌ उनमें से कुछ को याद है कि वह एहसास, वह अनुभव, कैसा था। वे सभी जानते हैं कि वे जो पढ़ा रहे हैं वह केवल 400 साल पुराने पाठ की समझ नहीं है। इसके बजाय, यह देखने, समझने, लिंग का सम्मान करने का एक तरीका है जिसके लिए छात्रों के अन्य सांस्कृतिक इनपुट शायद हमेशा विश्वसनीय रास्ते प्रदान नहीं करते।

2026 में भारत एक ऐसा देश है जिसे अभी भी सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के बारे में कई जरूरी और अनसुलझी बातचीत करनी है; सुरक्षा के बारे में, प्रतिनिधित्व के बारे में, संवैधानिक वादे और जिए गए यथार्थ के बीच के अंतर के बारे में। हमारा राष्ट्र एक ऐसा देश है जिसमें महिलाओं के अधिकारों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)!का फैसला दैनिक आधार पर महिलाओं के खिलाफ नियमित हिंसा के साथ खुलेआम सह- अस्तित्व में है। हमारा एक ऐसा देश भी है जिसमें एक युवा (किशोरी) लड़की को, सांख्यिकीय रूप से, अपने भाई की तुलना में करियर बनाने के लिए कम प्रोत्साहन मिलेगा, और फिर भी अक्सर परीक्षाओं में उससे बेहतर प्रदर्शन करेगी।
वर्तमान लड़कियाँ सम्भवतः इस साल एक पाठ खोलेंगी और पोर्शिया, रोजालिंड, गर्टरूड, हर्मायनी के बारे में पढ़ेंगी। वे, अगर उनके पास अच्छे शिक्षक हैं, तो समझेंगी कि ये औरतें तर्क का मूल हैं, वह एक, सर्वव्यापी तर्क जो स्पष्ट करता है कि बुद्धि और वाक्पटुता लिंग-आधारित नहीं है, और यह कि विचार की गुणवत्ता से कहानी को नियन्त्रित करने की क्षमता केवल पुरुषों की नहीं है। यह एक तर्क है जो चार देशों से ज्यादा पुराना है। यह 2026 के भारत में अभी भी क्रान्तिकारी है।

एक शहरी भारतीय कक्षा में 13 वर्ष की छात्रा को एलिजाबेथन थियेटर के महिलाओं पर प्रतिबन्धों के बारे में, या नारीवादी साहित्यिक आलोचना के इतिहास के बारे में कि क्या शेक्सपियर एक प्रोटो-नारीवादी थे या बस एक व्यावसायिक रूप से चतुर‌ नाटककार जो जानते थे कि मजबूत महिला पात्र दर्शकों को आकर्षित करते हैं, जानने की जरूरत नहीं है। उसे बस इसे होते हुए देखने की जरूरत है। उसे यह देखने की जरूरत है कि पाठ — यह पुराना, कठिन, पुरातन पाठ जो उसके शिक्षक ने उसे दिया है — मानता है, क्योंकि इसके लेखक ने माना, कि चीजों को करने का यह तरीका स्वाभाविक है, और उसे समझने की जरूरत है कि इसका मतलब क्या है। सबसे महत्त्वपूर्ण, उसे यह जानने की जरूरत है कि अस्तित्व का यह तरीका भी है, और हमेशा सम्भव होना चाहिए।

Pages: 1 2


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *