4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

पुस्तक मेले क्यों नहीं बढ़ा पा रहे किताबों के प्रति प्रेम?

पहले कलकत्ता में बहुत किताबें छपती थीं, बनारस छपाई का बड़ा केंद्र था। बाद में बंगला साहित्य का अनुवाद खूब बिकता था। दिल्ली में प्रकाशन व्यवसाय शुरू करने में ऋषभरुद्र जैन की बड़ी भूमिका है। यह 1934 की बात है। उस दौर में आर्य समाज की पुस्तकों का महत्व था। घरों में लोग मगही, अवधी, ब्रजभाषा आदि बोलियों का प्रयोग करते थे, आज भी करते हैं। लखनऊ का नवलकिशोर प्रेस काफी लोकप्रिय था। वह मेले-ठेले के अवसर पर नौटंकी या किस्सा तोता-मैना की पुस्तकें छापकर बेचता। भारत विभाजन के बाद दिल्ली में काका कालेलकर की अध्यक्षता में एक मीटिंग हुई। उस मीटिंग में रामेश्वरी नेहरू भी थी। मैंने कालेलकर साहब से कहा कि यह लोगों की रुचि बिगाड़ने की साजिश है। कालेलकर का कहना था कि मेलों में तोता-मैना के किस्सों की बजाय मोटे टाइप में गांधीजी का साहित्य बेचा जाए। उस समय मैंने कहा कि लोग बहुत चालाक हो गए हैं, वे ऐसे किताबें नहीं खरीदेंगे।

हिंदीभाषी क्षेत्र में साक्षरता बहुत कम है। जहां साक्षरता ही नहीं है, वहां पुस्तकों के लिए प्रेम पैदा करना बहुत मुश्किल है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने पहले पुस्तक मेले पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि ‘अंधों के गांव में सुरमे की दुकान’। यही पुस्तक मेले का हाल है। पुस्तक के प्रति लगाव पैदा करना है तो केरल और महाराष्ट्र की तरह लाइब्रेरी आंदोलन करना होगा। इससे पुस्तक आंदोलन बढ़ेगा। मेले लगाने से पुस्तकों के प्रति लगाव नहीं बढ़ता। हर साल सिर्फ मेला लगने से पुस्तक का प्रेम नहीं बढ़ता।

जब नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना की पहली मीटिंग हुई थी, मैं मौजूद था। उस समय नेहरू ने कहा था कि कृष्ण मेनन चाहते हैं कि पेंगुइन की तर्ज पर एक संस्था खोली जाए। लंदन में सिगरेट की दुकान पर भी पेंगुइन की किताब मिल जाती है। हमें भी ऐसा माहौल पैदा करना होगा। उनकी इच्छा थी कि पुस्तकें सस्ती हों, हर आदमी तक पहुँचे। इस उद्देश्य की कालांतर में इतिश्री हो गई। इस ट्रस्ट को थके-हारे राजनेताओं का आश्रय स्थल बना दिया गया। एक बार आचार्य नरेंद्र देव की जन्मशती पर उनकी रचनावली छापने का प्रस्ताव पास हुआ, वह आज तक लागू नहीं हो पाया।

पुस्तकों को जनता तक पहुँचाने के लिए प्रकाशक-रूपी दलाल को बीच से हटाना जरूरी है। तभी कुछ हो पाएगा। बंगाल में लेखकों पर अगाध आस्था है। बंगाल में एक मर्तबा एक भिखारी को क्रिकेट पर एक पुस्तक की जरूरत थी। वह याचना भरी नजर से प्रकाशक की दुकान पर खड़ा था। भिखारी के पास पैसे नहीं थे। उस समय प्रकाशक ने उसे पुस्तक ऐसे ही दे दी। बंगाल में तो पुस्तक खरीदने के लिए लोग भीख भी मांगते हैं। साक्षर लोगों में भी पाठकीय अभिरुचि नहीं है। इनमें अधिकतर लोग यह जानना चाहते हैं कि ड्राइवर, मैकेनिक, इंजीनियरिंग या इलेक्ट्रॉनिकी का कारीगर कैसे बनें। वह सोचता है कि हम कैसे पैसा कमाएं। एक कारण यह भी है कि लेखक लेखकों के लिए लिख रहे हैं, इसीलिए पाठक से नहीं जुड़ पाते हैं। हिंदी में अब साहित्यजीवी नहीं रह गए हैं। एकमात्र नागार्जुन और अमृतलाल नागर रह गए हैं, जो शुद्धमसीजीवी हैं। मेरे पचास साल के लेखन में कभी संतोषजनक रॉयल्टी नहीं मिली। प्रकाशक सूचना तक नहीं देते कि कितनी पुस्तक छाप रहे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी कहते थे कि लेखक तो बेचारा किसान है, जो कि लगातार छीजता जाता है।

बीच में प्रकाशक रूपी दलाल मोटे होते जाते हैं। इन्हें वे साहित्य-परोसक कहते थे। आज नाथूराम प्रेमी जैसे प्रतिबद्ध प्रकाशक नहीं हैं। आदर्शवादी और त्यागी प्रकाशक नहीं हैं। किताबों का मूल्य ज्यादा इसलिए होता है कि ऊपरी टीम-टाम ज्यादा होती है। इसकी जरूरत खरीद के लिए होती है। आज किसी भी लेखक को अपनी भी पुस्तकें खरीदना संभव नहीं है। ग्रंथावलियां इतनी महंगी हैं कि उन्हें आम पाठक खरीद नहीं सकता। हिंदी के लेखक अल्पदृष्ट हैं। वे अन्य भारतीय भाषा और उनके सांस्कृतिक जीवन पर नहीं लिखते, उनकी भाषा को नहीं पढ़ते। इससे राष्ट्रीय एकता भी सही रूप में नहीं मिल पाती।

प्रभाकर माचवे
(लेखक-विचारक)