national educational cultural festival
वर्ष 1985: 30 सितम्बर – 07 अक्तूबर
वर्ष 1988: 13 नवम्बर – 23 नवम्बर
वर्ष 1990: 20 नवम्बर – 03 दिसम्बर
वर्ष 1991: 01 दिसम्बर – 15 दिसम्बर
✍️ किताबों 📚 की अहमियत को कौन चुनौती दे सकता है भला ? इंसान के अन्दर छाये अज्ञान के अंधेरे को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है किताबें ! सचमुच किताबें एक मार्गदर्शक की तरह अनजान चीजों और अपरिचित क्षेत्रों से आपका परिचय कराती हैं, आपमें सोचने-समझने की क्षमता जागृत करती हैं तथा इंसानियत का पाठ पढ़ाकर आपको एक अच्छा मनुष्य बनाने में अहम् भूमिका निभाती हैं।
वैसे तो सारे देश में शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है मगर बिहार में शैक्षणिक व एक सीमा तक सांस्कृतिक स्तर में हो रही निरन्तर गिरावट अखबारों की सुर्खियाँ बनती जा रही हैं। राज्य के कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों की गिरती साख और बौद्धिक गतिविधियों की कमी पर अनेक प्रश्न-चिन्ह खड़े कर दिए गए।
लिहाजा 1988 में पटना में प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े चन्द उत्साही युवाओं ने इन आरोपों को गम्भीरता से लिया और बिहार में पठन-पाठन के कार्य को सुचारू रूप से चलाने तथा लोगों में पुस्तकों के अध्ययन के प्रति अभिरुचि व उत्साह जगाने हेतु पुस्तक मेला आयोजित करने की एक महत्त्वाकांक्षी योजना तैयार की। वैसे भी, पटना में लम्बे अर्से से रह रहे लोग भी बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे थे कि पटने में नई शैक्षिक गतिविधियाँ शुरू हों ताकि आम लोगों को रोजमर्रे की जिन्दगी से, थोड़े समय के लिए ही सही, निजात मिले।
पटना में पुस्तक मेला आयोजन करने की परिकल्पना वर्ष 1985 में ही ‘बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ’ (जो वित्तीय वर्ष 1950–51 में स्थापित हुआ) के तत्वावधान में अर्ध-सरकारी राजेन्द्र नगर सामुदायिक भवन हुए वार्षिक अधिवेशन में की गई थी जिसका सभापतित्व हिन्दी प्रगति समिति के सदस्य डॉ० उमाचरण झा (सेवानिवृत्त दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष राँची विश्वविद्यालय) ने की थी। पटना पुस्तक मेला की परिकल्पना को बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के महासचिव श्री नरेन्द्र कुमार झा (प्रबन्ध निदेशक, नोवेल्टी एण्ड कम्पनी) एवं पुस्तक-व्यवसाय से जुड़े कुछ अन्य सदस्यों ने साकार कर दिया।
उल्लेखनीय है कि यूबीएस पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली के व्यवस्थापक चावला साहेब ने वर्ष 1985 में अपने प्रतिष्ठान की पटना शाखा स्थापित की। पटना के वाशिंदा इस शाखा के प्रबन्धक श्री एच०एल० गुलाटी गैर-बिहारी होने के बावजूद पटना में पुस्तक मेला आयोजित करने में भरपूर दिलचस्पी ली। श्री गुलाटी को देश में इस तरह के मेले आयोजित होने का काफी पूर्व अनुभव भी था और बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के उत्साही महासचिव श्री नरेन्द्र कुमार झा ने न सिर्फ उन्हें सक्रिय सहयोग दिया बल्कि प्रसन्नता के विभिन्न दायित्वों का वहन भी किया।
इस बीच नरेन्द्र कुमार झा ने दिल्ली में बिहार के प्रमुख सांसद श्री डी०पी० यादव एवं भारतीय बाल शिक्षा परिषद् दिल्ली (Indian Council for Child Education Delhi) व भारतीय शैक्षिक प्रकाशक महासंघ दिल्ली (Federation of Educational Publishers in India) के उच्चाधिकारियों से भी मुलाकात की। उन्हें यह सुझाव दिया गया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मशती (14 नवम्बर 1988) के अवसर पर वे बाल पुस्तक मेले का आयोजन करें तो इसके लिए उन्हें कुछ आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाएगी।
पटना लौटकर श्री झा ने दिल्ली में हुई वार्ता के आलोक में पटना पुस्तक मेला आयोजित करने का निर्णय ले लिया। इसके पश्चात पुनः दिल्ली में पूर्व उपराष्ट्रपति डॉ बी०डी० जत्ती के सभापतित्व में पटना पुस्तक मेला आयोजन व सलाहकार समिति की संसद भवन, दिल्ली में 21 अक्तूबर 1988 को अन्तिम बैठक हुई जिसमें उन्हें पटना पुस्तक मेला का मुख्य संरक्षक (आजीवन) बनने का अनुरोध किया गया।
मेले के प्रति स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी का रूख भी बड़ा उत्साहवर्धक रहा। उन्होंने अपने रंगीन चित्र पर एक नारा लिख “हर पुस्तक एक मशाल है” ओर उसे देशभर में वितरित किया गया। यह वाक्य पुस्तकों के प्रति उनके रूझान का प्रतीक था।
बहरहाल, पटना पुस्तक मेला 1988 बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के झण्डे तले भारतीय बाल शिक्षा परिषद् (Indian Council for Child Education, Delhi) तथा भारतीय शैक्षिक प्रकाशक महासंघ (Federation of Educational Publishers in India, Delhi) के सहयोग से आयोजित किया गया। इस मेले में देश भर के करीब 100 प्रकाशकों ने भाग लिया। मेले के लिए रैकों की व्यवस्था नेशनल बुक ट्रस्ट (National Book Trust, India Delhi ने की। हालांकि स्टॉल धारकों को थोड़ी असुविधाओं का सामना करना पड़ा, मगर कुल मिलाकर मेला सफल रहा। बहुत बड़ी संख्या में मेला स्थल पर लोगों की भीड़ जमा हुई और भारी संख्या में पाठकों ने पुस्तकें खरीदीं। स्टॉलों के निर्माण तथा साज-सज्जा का काम एक स्थानीय डेकोरेटर ने किया था।
इस मेले की सफलता का श्रेय काफी हद तक बुद्धिजीवी वर्ग तथा संचार माध्यमों को जाता है। इनमें हिन्दुस्तान टाइम्स के तत्कालीन सम्पादक श्री एस सेन, टाइम्स ऑफ इंडिया के तत्कालीन सम्पादक श्री पी० सेन और श्री संजय दत्ता, हिन्दुस्तान टाइम्स की श्रीमती श्रुति शुक्ला और डॉ श्रीवास्तव, टाइम्स ऑफ इंडिया के श्री उज्ज्वल सिंह, आज के श्री सुधांशु शेखर, हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञापन प्रबंधक श्री ए०एस० रघुनाथ, गृहसचिव श्री जियालाल आर्य, विज्ञापन एजेंसी से जुड़े श्री खुर्शीद अहमद (उनकी अपनी एजेन्सी एडवांटेज मीडिया कंसल्टेंट है), मेले के आधिकारिक फोटोग्राफर श्री नौशाद रिजवी तथा महिमा एडवर्टाइजिंग एजेंसी के श्री अरूण गुप्ता खास तौर पर उल्लेखनीय रहे।
वैसे तो पटना पुस्तक मेला शानदार ढंग से सफल रहा और पाठकों ने भारी संख्या में पुस्तकें खरीदीं फिर भी आयोजकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। मेले में भाग लेने वाले प्रकाशकों ने भी सुविधाओं की कमी की ओर आयोजकों का ध्यान आकृष्ट किया। ऐसी आम राय बनी कि इस मेले का हर वर्ष आयोजन करना सम्भव नहीं होगा, लिहाजा जनता द्वारा नियमित रूप से हर वर्ष मेले का आयोजन करने की माँग को नजरंदाज करते हुए हर दूसरे वर्ष पुस्तक मेला आयोजित करने का निर्णय लिया गया।
इस बीच बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ एक सशक्त संगठन का रूप अख्तियार कर चुका था पटना पुस्तक व्यवसाय से जुड़े किरण प्रकाशन के श्री सत्यनारायण प्रसाद जैसे चन्द युवा उत्साही लोगों ने प्रतिवर्ष मेला आयोजित करने हेतु एक संस्था बनाने का सुझाव दिया।
वर्ष 1985 के बाद वर्ष 1988 पटना पुस्तक मेला का उद्घाटन करने की पूर्व स्वीकृति हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी — जिसका आधार बना है उनके हस्ताक्षरसहित उस समय की उनकी तस्वीर के साथ कैलेंडर पर उनका एक वाक्य (Slogan) : ‘हर पुस्तक एक मशाल है” — ने दे दी थी , मगर देश में राजनीतिक उथल-पुथल होने की वजह से वे निर्धारित तारीख को पटना नहीं आ सके।
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