4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

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बंद होते पुस्तकालयों को बचाने की जरूरत

यह बात ज्यादातर लोग जानते हैं कि हुमायूं की मृत्यु अपने पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने से हुई थी। पर वह पुस्तकालय कहाँ, इसकी जानकारी बहुत कम को है। बाबर के शासनकाल में राजधानी आगरा थी। हुमायूं सिंहासन पर बैठने के बाद राजधानी दिल्ली ले आया था। दिल्ली में हुमायूं ने दीनपनाह नाम से एक नया शहर बसाया जो आज के पुराना किला वाला ही क्षेत्र था। यहीं पर भव्य इमारत शेर मंजिल के नाम से मशहूर थी जिसके खंडहर पुराना किला में आज भी मौजूद हैं। इसी शेर मंजिल में, फारसी साहित्य के अनुसार, जग प्रसिद्ध पुस्तकालय था लेकिन आज यह इतिहास की वस्तु बन गया है।

पुस्तक संग्रह का प्रचलन प्राचीनकाल से चला आ रहा है। हमारे यहाँ ऋषि-मुनि पुस्तकें लिखने के साथ उनका संग्रह भी किया करते थे। ऐसे ही संग्रहों में से सैकड़ों किताबें खलीफा हारून रशीद के बगदाद स्थित विश्वविद्यालय में अनुवाद के लिए ले जाई गई थीं। पर इनमें से ज्यादातर के ज्ञान से हम अछूते ही रह गए हैं।

पूर्वजों की शिक्षा, ज्ञान और अनुभव आनेवाली पीढ़ियों को लगातार मिलते रहें इसके लिए पुस्तकालय ही सबसे कारगर जरिया रहे हैं। आजादी के बाद शिक्षा के लिए प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने के लिए पुस्तकालय की उपयोगिता, उनकी स्थापना और विकास में बहुत पैसा खर्च किया गया। आधुनिक सुविधाओं वाली इमारतों में प्राचीन और आधुनिक पुस्तकों के भंडार को संजोया गया जिनसे जनता में अध्ययन की प्रवृत्ति बढ़ाने में काफी मदद भी मिली। इसी के नतीजतन आज दिल्ली में लगभग डेढ़ सौ छोटे-बड़े पुस्तकालय हैं।

बहावलपुर हाऊस, मंडी हाऊस स्थित केंद्रीय सचिवालय, पुस्तकालय की स्थापना 1944 में हुई थी। यह अपनी कई तरह की किताबों के लिए प्रसिद्ध था। इसमें भारत की मान्यता प्राप्त सभी भाषाओं में लगभग दस हजार साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व की पुस्तकें आज भी उपलब्ध हैं। तीन साल लगातार बंद रहने के बाद दस माह पहले इसे दोबारा खोला गया है। हर भाषा के लिए अलग लाइब्रेरियन की जगह पर चार-छह कर्मचारियों के भरोसे चल रहे इस पुस्तकालय की सदस्य संख्या नहीं के बराबर है। फटी-पुरानी पुस्तकें अपनी अव्यवस्था की शिकायतें करती हैं मगर पुस्तकालय अधिकारी का कहना है कि पंद्रह हजार रुपए से ज्यादा किताबों की जिल्दबंदी पर खर्च किए जा चुके हैं। पहले इस पुस्तकालय को साहित्य अकादेमी के पुस्तकालय से मिलाने का विचार था पर अब पुस्तकालय समेत पूरा बहावलपुर हाऊस नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा को दे दिया गया है और इसे कभी भी बंद किया जा सकता है।

‘दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी को एशिया की सबसे व्यस्त लाइब्रेरी होने का गौरव प्राप्त हुआ है।’ यह बात संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1966 में एक सर्वे रिपोर्ट में कही गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ की देखरेख और सहायता से स्थापित यह दिल्ली ही नहीं भारत की सबसे बड़ी पब्लिक लाइब्रेरी है। इसकी सभी सेवाएं भी निःशुल्क हैं। यह संयुक्त राष्ट्र द्वारा विकासशील देशों के लिए ‘पायलट प्रोजेक्ट’ का नमूना थी। इसकी सेवाएं देहातों से शहर तक बच्चों से बूढ़ों तक, नेत्रहीनों से कैदियों तक, खिलाड़ियों, कलाकारों तक सभी के लिए अलग-अलग समर्पित हैं।

इतने बड़े पुस्तकालय को व्यवस्थित ढंग से चलाने का ढांचा संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार किया गया है और उसी द्वारा इसके निदेशक को प्रशिक्षण भी दिया जाता है किन्तु प्रबंधन के अभाव में यह पुस्तकालय कर्मचारी आलय बन कर रह गया है। अधिकारी कर्मचारियों की सुविधाएं हड़पे हुए हैं तो कर्मचारी पाठकों की। पाठकों को पर्याप्त हवा और रोशनी ही नहीं शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है। करोड़ों रुपए वार्षिक बजट में से पठन सामग्री पर केवल 5-6 फीसदी ही खर्च हो पाते हैं जबकि 75 फीसदी से ज्यादा रकम अधिकारियों और कर्मचारियों पर खर्च होती है और यह अनुपात लगातार बढ़ रहा है। पाठकों के अनुसार कई साल से पुस्तकें नहीं खरीदी गई हैं। 1984 में इसी में एक खुला पुस्तकालय का शिलान्यास हुआ है। जो अब कूड़ा फेंकने, सोने और कर्मचारियों के ताश खेलने के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहा है। ज्यादातर अधिकारी इन दुर्दशाओं का कारण फंड की कमी बताते हैं तो कर्मचारी प्रबंधकों पर भेदभाव और उदासीनता बरतने का आरोप लगाते हैं। और पाठकों का मानना है कि अच्छी किताबें अधिकारी निजी सेल्फ में रखते हैं या अपने परिचितों को दे देते हैं जबकि पुस्तकालय की सदस्य संख्या पांच से दस हजार प्रतिवर्ष कम हो रही है।

सप्रू हाऊस में आई०सी०डब्ल्यूए द्वारा 1943 में स्थापित एक प्रतिष्ठित पुस्तकालय है। विदेशी मामलों के लिए अनुपम इस पुस्तकालय की गिनती एशिया की तीन सबसे बड़ी लाइब्रेरियों में होती है। यहाँ पूरे विश्व की जानकारी विशेष रूप से विदेशी राजनीति पर आधारित पुस्तकें और रिपोर्ट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थी। शोध करने वालों के लिए यह पुस्तकालय वरदान था। भारतीय विदेश नीति से जुड़े लोग दशकों तक इस पुस्तकालय से जुड़े रहे हैं। लेकिन यह लाइब्रेरी आज उजाड़ पड़ी है। इक्का-दुक्का पाठक आते हैं। सैकड़ों पाठकों की क्षमता वाले सेंट्रल हाल की कुर्सियाँ खाली पड़ी रहती हैं।

शोधकर्ताओं के लिए खासतौर से सुसज्जित कमरा बंद पड़ा है। पुस्तकें धूलगर्द से अटी इधर-उधर पड़ी हैं। कैटलॉग पर धूल की मोटी परत जम चुकी है। जहाँ सैकड़ों पत्र-पत्रिकाएं होती थीं, एकाध अखबार की निःशुल्क प्रति और कूड़ों के सिवा कुछ नहीं है। जापानी फोटोस्टेट मशीन तालाबंद कमरे में जंग खा रही है। सैकड़ों की संख्या में नक्शे और कैलेंडर धूल भरी अलमारियों में ठंसे पड़े हैं। चटकी दीवारों पर मकड़ी के जाले और दीमक हैं। यहाँ सौ साल पुराने अखबारों की फाइलें तो ढूंढ़ कर निकाली जा सकती हैं पर एक हफ्ते पुराना अखबार नहीं मिल सकता।

इस पुस्तकालय में पिछले साल केवल 60-65 सदस्य थे वह बहुत कम आते थे, जबकि 1981 में पाँच सौ सदस्य थे। इससे पहले इनकी संख्या ज्यादा थी। फिर भी आई०सी०डब्ल्यूए के अध्यक्ष हरचरण सिंह जोश कहते हैं ‘लाइब्रेरी बहुत अच्छी चल रही है, हर साल लगभग डेढ़ लाख की किताबें आती हैं। जबकि सरकार ने 1986 से ग्रांट बंद कर रखी है।’ कर्मचारी कहते हैं ‘हम 1986 के वेतन पर काम कर रहे हैं जबकि महंगाई कई गुणा बढ़ चुकी है।’ पाठक कहता है ‘वर्षों से किताबें और रिपोर्ट नहीं आई।’ हालांकि पुस्तकालयों की दुर्दशा पर संसद में भी आवाज उठती रही है।

1916 में बनी हरदयाल म्युनिसिपल लाइब्रेरी, कभी हार्डिंग लाइब्रेरी के नाम से जानी जाती थी। इसकी वास्तविक स्थापना कंस्टीच्यूट बिल्डिंग में 1916 से कई साल पहले हो चुकी थी। दिल्ली की पुरानी लाइब्रेरियों में से एक इस पुस्तकालय में सभी विषयों पर एक लाख बासठ हजार पुस्तकें हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में उपलब्ध हैं। जिनमें दस हजार पुस्तकें लुप्तप्रायः हैं। व्यस्ततम इलाके दिल्ली रेलवे स्टेशन और चांदनी चौक के बीच स्थित यह पुस्तकालय विद्यार्थियों के लिए उपयोगी रहा है किन्तु कई महीनों से यह पुस्तकालय बिना लाइब्रेरियन के चल रहा है। 1989 से कार्पोरेशन भंग होने के कारण 11 में से केवल 4 सदस्य ही कार्यकारिणी में रह गए हैं। इसकी नौ शाखाओं समेत केवल 25 लाख रुपए सालाना अनुदान मिलता है। फंड की कमी के कारण नई पुस्तकें नहीं खरीदी जा रही हैं जबकि छात्रों का कोर्स हर वर्ष बदलता है। अवैतनिक सचिव द्वारा चंदे की दरों में बेतहाशा वृद्धि के कारण सदस्यों की संख्या बहुत तेजी से घटी है। आजीवन सदस्यता सौ से एक दम पांच हजार कर देने के कारण यह स्कीम लगभग समाप्त हो गई है।

भारत सरकार सूचना केंद्र का पुस्तकालय कनाट प्लेस में है। इसकी स्थापना अमेरिकन और ब्रिटिश कौंसिल लाइब्रेरी के समकक्ष 1954 में की गई थी तब इसे पंडित गोविंद बल्लभ पंत जैसे पाठकों ने सुशोभित किया था। आज इस पुस्तकालय के लिए एक पैसे का फंड नहीं है। 1981 से कोई पुस्तक नहीं खरीदी गई है। पत्र-पत्रिकाएं भी नाममात्र की रह गई हैं। आधी बिल्डिंग वेतन एवं लेखा विभाग को दे दी गई है।
भारत के ज्यादातर पुस्तकालयों का यही हाल है। जबकि अमेरिकन और ब्रिटिश कौंसिल लाइब्रेरी कंप्यूटर, वीडियो सहित सभी तरह की आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित पाठकों को बड़ी संख्या में आकर्षित कर रही है।

सरकार भी कुछ पुस्तकालयों के आधुनिकीकरण पर करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। जैसे जवाहरलाल नेहरू म्यूजियम लाइब्रेरी, मेटकॉफ भवन में ‘डेसीडॉक’ की लाइब्रेरी, या ‘इन्सडॉक’ की लाइब्रेरी है। किंतु समाज में इनका कोई विशेष योगदान नहीं है जबकि लाखों पाठकों की सेवा करने वाली दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी टीन के छतों और खस्ताहाल कमरों में चल रही है जहाँ हर तरह के मौसम का प्रकोप रहता है।
लाइब्रेरियों के साथ अगर सरकार का यही सलूक रहा तो एक दिन इनका हाल भी शेरमंजिल जैसा ही होगा और शिक्षा के प्रचार व प्रसार की कोशिशें मिट्टी में मिल जाएंगी, बल्कि अपने पूर्वजों की उस महान धरोहर से भी वंचित रह जाएंगे, जो शेरमंजिल के खंडहरों में दफन होने से बच गई थी।

लेखक – एम० ए० सिद्दिकी