4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

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हिमालय की गोद में महादेवी साहित्य संग्रहालय

हिमालय के साथ भारतीय साहित्य, संस्कृति और ज्ञान का अविच्छिन्न संबंध रहा है। सौंदर्य के आराधक तथा तत्व के अन्वेषक दोनों को हिमालय की गोद में समान रूप से लौकिक और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती रही है। इसीसे वहाँ व्यक्ति या संस्था की सिद्धि अपने आप में एक सिद्धि है। हिमालय की गोद में ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति, साहित्य के अनेक केंद्र हैं, परंतु ऐसे साहित्य-संस्कृति केंद्र की अपेक्षा स्वाभाविक थी, जिसमें सभी क्षेत्रों के व्यक्ति एकत्र होकर अपने स्वप्नों को सामंजस्यपूर्ण आकार दे सकें।

इसी उद्देश्य से नैनीताल से 25 किलोमीटर दूर तक सुरम्य पर्वतीय क्षेत्र रामगढ़ के उमागढ़ नामक ग्राम में 1937 में महादेवी वर्मा ने कुछ भूमि खरीदी थी और अपने अध्ययन-मनन के लिए छोटा-सा भवन बनवाया था। यहाँ वे प्रतिवर्ष गर्मियों में पशु-पक्षियों के अपने विशाल परिवार के साथ जाती थीं और साहित्य-सृजन के साथ-साथ समाज सेवा का कार्य भी करती थीं। यहाँ चारों ओर हिमालय की सुंदर पर्वत-श्रृंखलाएँ– नंदा देवी, त्रिशूल, पंचचुली, नीलकंठ, नंदाघुंटी आदि की पावन धवल छटाएं बिखरी हुई हैं। महादेवी जी ने वहाँ रहकर साहित्य-साधना तो की ही, यहाँ के लोगों को, विशेषकर नारी समाज को मानवीय संवेदनशीलता, आर्थिक आत्मनिर्भरता एवं स्वाभिमान की दिशा में आगे बढ़ाया।

कृतज्ञता स्वरूप यहाँ के निवासियों ने महादेवी जी के उस जीर्ण-शीर्ण भवन को एक स्मारक के रूप में विकसित करने का फैसला किया है। साथ ही इसे संपूर्ण हिंदी साहित्य के स्मृति-स्थल एवं रचना-प्रेरणा केंद्र के रूप में विकसित करने का भी प्रयत्न किया जा रहा है। इस स्थान में हिमालय प्रेमी रचनाकारों एवं संस्कृति प्रेमियों के लिए रचनात्मक ऊर्जा तथा सृजनात्मक एकांत का वातावरण प्रदान करने की चेष्टा की जा रही है। एक ऐसा एकांत, जो हमारे वातावरण में से दिनों-दिन छिनता चला जा रहा है। एक ऐसा एकांत, जिससे लेखक एक समूची सृष्टि की रचना कर सकता है।

सृजनधर्मी रचनाकारों को एकांत प्रदान करने के साथ-साथ इस संग्रहालय में महादेवी के सपनों के छायावाद की पुनर्व्याख्या की जाएगी और इस बहाने भारतीय पुनर्जागरण से जुड़ी इस बीसवीं सदी के रचनाधर्मी निष्कर्षों के प्रयोगों पर शोध की एक सार्थक परंपरा आरंभ होगी। साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत प्रभावशाली संस्कृतिकर्मियों के बीच आपसी संवाद भी स्थापित किया जाएगा। इस प्रकार महादेवी साहित्य संग्रहालय साहित्य, संस्कृति एवं कलाओं का जहाँ एक ओर आदर्श-प्रामाणिक संकलन कर सकेगा, वहीं दूसरी ओर संस्कृति की गतिशील धारा को भारतीय समाज एवं मनीषा के संदर्भ में विकसित करने का दायित्व भी हाथ में लेगा।

उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है। यहाँ शताब्दियों से प्रकृति एवं मानव जीवन के रहस्यों की खोज हेतु ऋषियों-मुनियों एवं जिज्ञासु यायावरों ने साधना की है। इसी देवभूमि में एक और ऋषितुल्य कवि ने साहित्य-साधना की थी। 1930 में गुरुदेव विश्व कवि रवींद्रनाथ ठाकुर अपनी बेटी के स्वास्थ्य लाभ के लिए उत्तराखंड आए थे। काठगोदाम से पैदल चलते हुए वे भीमताल पहुँचे थे। उनके प्रशंसक स्विट्जरलैंड निवासी मिस्टर डैनियल उनको अपने साथ रामगढ़ लाए। कुछ दिन उनके घर ही अतिथि रहने के बाद डैनियल ने गुरुदेव के लिए भी समुद्री सतह से साढ़े आठ हजार फुट की ऊंचाई पर सबसे ऊंची चोटी पर एक भवन बनवाया जिसका नाम गुरुदेव ने अपनी कालजयी कृति के नाम पर ‘गीतांजलि’ रखा और यहीं रह कर उन्होंने भारतीय साहित्य की एकमात्र नोबेल पुरस्कार प्राप्त कृति ‘गीतांजलि’ का श्रीगणेश किया। यह जगह अब टैगोर टाप के नाम से मशहूर है।

आज इस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक भवन में बांज, बुरुंश व काफल के बड़े-बड़े वृक्ष उग आए हैं। देश-विदेश के अनेक पर्यटक आज भी गुरुदेव की इस साधना-स्थली के खंडहरों को देखने आते हैं। टैगोर टाप का यह भवन जमींदारी उन्मूलन से पूर्व महारानी सिंधिया के पास था, जिसे श्रीमती विजयाराजे सिंधिया ने महादेवी साहित्य संग्रहालय को देने का फैसला किया है।

इस संग्रहालय में आधुनिक हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का एक समृद्ध एवं प्रामाणिक पुस्तकालय बनाया जाएगा, जहाँ देश-विदेश के साहित्य प्रेमी एवं सृजन प्रेमी विद्वान अध्ययन, लेखन, मनन एवं शोधकार्य कर सकें। साथ ही यहीं कुमाऊंनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति का एक महत्वपूर्ण संग्रहालय बनाया जाएगा तथा कुमाऊं क्षेत्र की साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया जाएगा। गुरुदेव के भवन ‘गीतांजलि’ को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित किया जाएगा।

आशा है, हिमालय की गोद में यह जो सांस्कृतिक पहल की गई है, उससे प्रेरणा लेकर अन्य क्षेत्रों के लोग भी आगे आएंगे और अपने-अपने क्षेत्र में ऐसी पहल करेंगे। प्रेमचंद की लमही, निराला का गढ़ाकोला, हरिऔध का आजमगढ़, गुप्तजी का चिरगांव भी अभी उपेक्षित पड़ा है।

लेखक- राजेन्द्र उपाध्याय