अंग्रेजी की बैसाखी का सहारा कब तक
ओह नो ! डीयर स्पीक इन इंग्लिश प्लीज—जैसे ही ये शब्द कान में पड़े एकाएक यह समझ कर कि कहीं हमारे पास में हिन्दी में चर्चा करने पर तो किसी ने आपत्ति नहीं की, हम स्थिर हो गये व जैसे ही पलट कर देखा तो भ्रम दूर हो गया। वहाँ पर खड़ी पूर्ण मेकअप से रंगी-पुती, कीमती साड़ी पहने एक महिला ने अपने बच्चे से ये शब्द कहे थे। शायद वह स्वभाववश हिन्दी में दूसरे बच्चों से बात कर रहा था। कुछ ज्यादा जानने की उत्सुकता हुई क्योंकि वहाँ एक नहीं कई साहबों और मेम साहबों का हुजूम विलासों में अपनी देशी-विदेशी गाड़ियों की कतार के पास खड़ा था और आस-पास चहचहा रहे थे, नन्हें-नन्हें बच्चे जिन्हें देश के नौनिहाल कहना अधिक उपयुक्त होगा।
कुछ ही देर में पूरा मंतव्य समझ में आ गया। उस मशहूर स्कूल को देखकर कि ये लोग यहाँ क्यों खड़े हैं? उसका वर्णन यहाँ अलग विषय होगा जो बाल मनों के प्रवेश हेतु अग्नि परीक्षा से गुजरने के संदर्भ में है, लेकिन इस घटना की एक बात मस्तिष्क में कौंधती रही कि उस महिला ने शब्द क्यों कहे होंगे? क्या उसका हिन्दी से कुछ विरोध था अथवा अंग्रेजी से लगाव? थोड़ा दिमाग पर दबाव डालने से यह स्पष्ट हो गया कि उसका अंग्रेजी की महानता के प्रति मोह था।
इस प्रसंग से एक घटना और ताजा हो गयी जो इसी वर्ष (पिछले शिक्षा सत्र में) मुंबई में घटी थी। वहाँ एक महिला ने अपने छह वर्षीय बच्चे को चाकू मार दिया सिर्फ इसलिए कि वह ‘फोर्टी’ के हिज्जे ठीक से नहीं लिख पा रहा था। हालांकि चिकित्सकों के घंटों चलते रहे प्रयास-परिश्रम से बालक को बचा लिया गया।
इस घटना से यह तो स्पष्ट हो गया कि अभिभावकों पर अंग्रेजी का भूत किस तरह हावी हो गया। मान लिया जाये कि उस समय माँ का मस्तिष्क आवेशग्रस्त रहा हो, लेकिन छह वर्ष का बालक दिन भर में कितनी ही गलतियां करता होगा, उसे कितनी बार चाकू मारा जाता होगा। अंग्रेजी की बढ़ती ‘साख’ के प्रति ममत्व का उदाहरण जो कि पुत्र वात्सल्य को भी कुछ क्षण के लिए पीछे छोड़ बैठा।
आज अंग्रेजी और हिन्दी का द्वंद्व जिस तरह भारतीय जनमानस में छाया है उसका मूल कारण मात्र यही है कि हर एक के मन-मस्तिष्क में यह धारणा गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं कि अंग्रेजी की बैसाखी के लगाये बिना प्रगति की दौड़ में शामिल नहीं हुआ जा सकता, पर वे यह क्यों भूल जाते हैं कि बैसाखी के सहारे चला जा सकता है दौड़ा नहीं। दौड़ना है तो स्वयं के डगों में शक्ति और सामर्थ्य चाहिए।
यहाँ ‘स्वयं के डगों’ इसलिए कहना पड़ रहा है कि किसी की मातृभाषा ही उसकी स्वयं की वह शक्ति हो सकती है जिसके आधार पर सृजन योग्य मौलिक चिंतन का जन्म होता है। यह एक शाश्वत सत्य है कि सृष्टि के हर देश व हर समय में मौलिक चिंतन का जन्म उसकी मातृभाषा में ही हुआ है। इस तथ्य पर संसार के सम्पूर्ण विद्वान एक मत हैं कि किसी भी बच्चे का प्रारम्भिक शिक्षण उसकी मातृभाषा में होना चाहिए। दूसरी भाषा लादने से उसके ऊपर दोहरा दायित्व एक भाषा के ज्ञान व दूसरा विषय वस्तु के ज्ञान का आ जाता है जिससे उसका अपेक्षित विकास नहीं हो पाता है।
कार्यालयों से लेकर सड़क गलियारों तक अंग्रेजी इस तरह हावी होने लगी कि अब लगता है कि जैसे हिन्दी विदेशी भाषा हो। हमारे अवचेतन में, नस-नाड़ियों में अंग्रेजी इस तरह प्रवाहित होने लगी कि हमें अंग्रेजी ही बोलने में और लिखने में गर्व अनुभव होता है। क्या शिक्षित, क्या अशिक्षित और क्या ग्रामीण, क्या शहरी, हर कोई अंग्रेजी में लंगड़ाते रहने में अपनी शान अनुभव करता है।
‘यह सोचकर और अधिक कष्ट होता है कि संस्कृति की जिस महानता के बल पर भारत सिरमौर रहा कहीं वह गौरव इस अंग्रेजियत की आंधी में लुप्त न हो जाये। यहाँ का साहित्य संस्कृति की धारा से हटकर होने पर भावी पीढ़ी कैसे जानेगी भारत को, उसके महान जीवन दर्शन को, उसकी उज्जवल-धवल गौरवमयी संस्कृति को। उसको जब घूँटी ही यह पिला दी जायेगी ‘इंडिया दैट इज भारत।”
प्रश्न भाषा का कम भावों का अधिक है। इस बहुरंगी देश में बहुरूपों में बिखरी हिन्दी जो कहीं ‘तुमारे को आना पड़ेगा’ तो कहीं ‘हम भी जाग गये थे’ और कहीं ‘का जा रिया है’ के अपने टूटे रूपों से दूसरे को जोड़ देती है। इसका विकास-विस्तार हो, इसका भण्डार और समृद्ध हो, इस हेतु यदि सकारात्मक प्रयास किये जाते हैं तो हिन्दी सम्मेलनों में गुणगान कर लेने से हिन्दी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ने वाला। हिन्दी अपने देश में जहाँ है जैसे है, पड़ी रहेगी।
लेखक – शशि साहू




