ताकि हिन्दी सम्मानित हो
लो हिन्दी दिवस फिर आ गया। अब सरकार भी क्या करे? यह धरती है न, वह मानती ही नहीं। इतनी शोख हो गयी है कि कर्फ्यू में भी नहीं रुकती। अपनी मर्जी से सूरज का चक्कर लगाकर धम्म से पहुँच गयी हिन्दी-दिवस लिये दिये।
क्या वह भी जमाना था जब पृथ्वी गोल-मटोल बैठी रहती थी और सूरज हाथ बांधे उसके चारों ओर चला करता था। राजा धरती का सब कुछ था। भगवान का प्रतिनिधि था। वह दिन को रात और रात को दिन कर सकता था और ऐसा करना भी उसके लिए कितना आसान था। गोरी के मुखड़े से घूँघट हटा दिया, दिन हो गया। लटें बिखेर दी, रात हो गयी। बुद्धिजीवी पार्षद भी कितने ईमानदार थे। राजा ने कहा- रात, तो सभासदों ने आसमान में छिटका दिये तारे, महबूबा के जूड़े में बांध दिया चाँद। आज के भारतरत्न क्या खा के करेंगे वैसे करतब?
बुरा हो गैलेलियो का, जिसने धरती को चला दिया सो भी सूरज के चारों ओर। काफिर कहीं का। गिरफ्तार तो वह हुआ और सजा भी पायी। उसे क्षमा भी मिल सकती थी पर वह इतना काइयाँ था कि जब उसे माफी मांगने को कहा गया तो बड़े भोलेपन से बोला कि वह तो चाहता है कि पृथ्वी न घूमे पर वह घूमती ही रहती है।
पर यह सब तो इतिहास है। सामयिक तथ्य तो यह है कि हिन्दी-दिवस आ गया। नौकरशाह ने तो जी जोड़ कोशिश की कि वह न आये और यदि वह आये भी तो विकलांग-दिवस के रूप में, अंग्रेजी की वैसाखी लगाये हुए, खैरात मांगते हुए। ऐसी वैसाखियों का इधर बहुत आयात हुआ है, निर्यात के नाम पर तो भारतीय प्रतिनिधिमंडल विदेश गया है अथवा अवमूल्यन हुआ है। फाइलों में उसे मारा, प्रमाण है उनमें पड़ी बेजान हिन्दी। तख्तियों में सरेआम व्याकरण-वध किया। ‘अनाधिकार’ प्रवेश की तख्ती सरकारी कार्यालयों के इतने द्वारों पर लगी है कि वह नवागन्तुक यह मानने लगे हैं कि ‘अनाधिकार’ नहीं वरन् सरकारी ‘अनाधिकार’ ही व्याकरण-सम्मत है।
रचन-संहार के रहे-सहे काम को दूरदर्शन ने पूरा किया। इधर साहित्यिक आदान-प्रदान के क्रम में जब भारतीय भाषाएं एक-दूसरे के पास आने के दौर में आ गयी और अंग्रेजी वैदुष्य के इस सिद्धांत की कुटिलता को उजागर करने लगी कि भारतीय भाषाओं के दो अलग-अलग कुल हैं- आर्यकुल तथा द्रविड़ कुल और बाप और बप्पा में या अम्बा, अम्मा और माँ में कोई संबंध नहीं, तब दूरदर्शन अहिन्दी भाषाओं के धारावाहिकों के संवाद अंग्रेजी में देने लगा कि लो बच्चू, अब देखते हैं कैसे भारतीय भाषाएं अपने भरोसे परस्पर संपर्क में आती हैं। तुम्हारे पल्ले कुछ न पड़ेगा जब तक तुम इंगलिस्तान से घूम न आओ या यही कहीं अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में भर्ती न हो जाओ।
अरे, अंग्रेजों के जमाने में संस्कृत की पढ़ाई भी तो अंग्रेजी के माध्यम से ही होती थी। हम इतना और जोड़ देते हैं कि अंग्रेजी माध्यम से संस्कृत पढ़ने वाले यदि चोटी के विद्वान न हुए तो महज इसलिए कि उन लोगों ने अपनी-अपनी चोटी (चुटिया) कटवा ली थी और बाबरी रख ली थी बिना यह जाने हुए कि ऐसा करके वे बाबरी मस्जिद की समस्या को पूर्वाशित कर रहे हैं।
गाँधी जन्म-शताब्दी पर प्रकाशित ‘तीसरी शक्ति’ में विनोबा भावे ने खुलकर लिख ही दिया था कि-
‘मुद मंगलमय संत समाजू।
जो जग जंगम तीरथ राजू॥
अब मैं इसको संस्कृत में कहता हूँ-
मुद मंगलमयः सत्समाजः।
यो जगति जड़ जंगमः तीर्थराजः॥
यानी तुलसीदास ने संस्कृत ही लिखी है। उन्होंने इतना ही किया कि जनता की भाषा में कहकर उसे जनता के बोलने योग्य बना दिया। (तीसरी शक्ति, पृ. 145)
दूरदर्शन ने इसका परीक्षण किया दो धारावाहिकों- रामायण और महाभारत में और दोनों स्मृति-धरोहर बन गये। दूरदर्शन यश पाकर धन्य हुआ पर वह भी पूर्वाशित न कर सका कि ऐसी हिन्दी के पर्दे से निकलकर कुछ पात्र संसद में जा बैठेंगे और सो भी विपक्ष में।
सुना अब दूरदर्शन अपनी दूरदर्शिता का प्रतिमान जटाऊ को न मानकर चील को मानता है, हालांकि चील भी चक्कर तो मारती है आकाश में पर उसकी दृष्टि रहती है धरती पर पड़ी असुरक्षित मांस के टुकड़े पर।
ऐसे में देवनागरी लिपि की बात कौन करे? विनोबा जी ने तो यहाँ तक कहा था कि यदि नागरी लिपि भारत में चलेगी तो जापान के लोग भी नागरी लिपि स्वीकार कर सकते हैं क्यों वे लिपि की तलाश में हैं। जापानी भाषा की रचना भारतीय भाषाओं की जैसी है न कि यूरोपियन भाषा के जैसी। (तीसरी शक्तिः पृ. 142)
लेकिन जब गाँधी जी की बात न सुनी गयी तो विनोबा की क्या सुनी जाती? इंदिरा गाँधी को अंत तक दो बातों का अफसोस रहा कि नौकरशाही पर काबू न पाया जा सका और शिक्षा में अपेक्षित सुधार न लाया जा सका। और, वे ही निहित स्वार्थों के दो अड्डे हैं जहाँ हिन्दी के विकास में नित नये अवरोध डालने तथा अंग्रेजी को अधिक से अधिक थोपने का सुनियोजित षड्यंत्र निरंतर चलता रहता है।
इधर वोट की राजनीति ने नया गुल खिलाया और हिन्दी के दो बड़े प्रदेशों—बिहार और उत्तर प्रदेश में उर्दू को द्वितीय राजभाषा बनाकर हिन्दी की हवेली में सौत तो बैठा ही दिया।
तो, ताजा खबर यह है कि हिन्दी के दो प्रदेशों—बिहार और उत्तर प्रदेश में सुराज की जगह दराज आ गया है।
सामाजिक संस्कृति के विकास के लिए अकबर के नौ रत्नों का भी ध्यान रखा गया, बीरबल जैसे विदूषकों के लिए खासतौर से। अकबर के नवरत्नों में जोड़-तोड़ में माहिर एक राजा टोडरमल थे, भारत सरकार के मंत्रिमंडल में तो अनेक राजा वेष बदलकर मंत्री बन गये हैं।
मगर अकबर तो जाहिल था। वह तो खानखाना जैसा रत्न भी रखता था जो इस बात के खिलाफ था कि मंत्री बड़ी जागीर रखें। उसे अंततः विद्रोह करना पड़ा। लाखों मध्यमवर्गीय लोग उसके साथ हो गये। वह पीपल के नीचे दरबार करता था।
वह विद्रोही खानखाना अब्दुल्रहीम खानखाना हिन्दी में रहीम कवि के नाम से प्रसिद्ध होकर कविता करता और सूर, तुलसी, मीरा, के साथ मिलकर जनता को जगाता रहा। सब जानते हैं कि सूरदास ने मोरमुकुटधारी एक चरवाहे को हिन्दुस्तान का राजा मान लिया था। तुलसीदास अर्थशुचि भारत को भारत का प्रतिनिधि न्यासी मानकर रामराज्य का अवतारणा का मंत्र पढ़ रहे थे और मीराबाई नारी-विद्रोह को राजमहल से निकाल कर सड़कों पर ले आयी थी।
भई, जाहिल के राज में यह सब तो होता ही है। अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों के आधुनिक शासन में और चाहे कुछ न हो, बातें ढंग से होती हैं, कभी खुले कमरे में कभी बंद कमरे में, कभी पंजी में कभी मंडल में।
लेखक – आचार्य केसरी कुमार




