4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

हिन्दी : अपने ही घर में बेगाना बर्ताव

अगर हम यह कल्पना कर लें कि मनुष्य किसी भाषा के बगैर आपस में सम्पर्क बनाये रखे तो यह बात उतनी ही हास्यास्पद एवं असंभव लगती है जितनी कि मनुष्य का हवा तथा पानी के बिना जिंदा रहने की कल्पना।

बच्चा जन्म लेने के कुछ दिन बाद से ही अपनी तुतलाती बोली में बोलना शुरू कर देता है। उसकी यह बोली सुनकर उसके माँ-बाप गदगद हो उठते हैं। बच्चों की तुतलाती बोलियों में इतनी मिठास तथा सरलता होती है कि माँ-बाप भी बच्चों के साथ तुतलाकर बोलने लगते हैं। खुशी के मारे उनका रोम-रोम पुलकित हो उठता है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि बच्चे की बोलियों में किसी प्रकार का भेदभाव या कृत्रिमता नहीं होती। आरंभ में ये बोलियां उन सभी दुनियावी तथा भाषाई बुराइयों, जटिलताओं तथा कुंठाओं से परे होती हैं जो बाद के दिनों में प्रायः ‘भाषा-भाषी’ के नाम पर इन्हें (बोलियों को) कई खंडों एवं खेमों में बांट देती हैं। बाद की बात बाद में। फिलहाल यही बोली बच्चों तथा परिवार के लोगों के बीच सम्प्रेषण तथा अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है और चूँकि यह इतनी आत्मिक तथा स्वच्छ होती है कि सबको, गैर भाषा-भाषी, भाषाविद् एवं जाहिल-गवारों को भी प्रिय लगती है। सबों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।

विश्व की तीसरी सबसे बड़ी तथा भारत में सर्वाधिक लोगों (लगभग 50 प्रतिशत) द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी की स्थिति क्या उन तुतलाते हुए बच्चों-जैसी है जो जन्म के बाद तो हिन्दी या अपनी मातृभाषा में बोलकर लोगों को गुदगुदाते हैं और जब वे पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र या दुनियादारी में प्रवेश करते हैं तो हिन्दी से नफरत तो नहीं, मगर अंग्रेजी-सा प्यार भी नहीं करते। जबकि अंग्रेजी जानने वाले एक प्रतिशत भी नहीं है। यह हमारी कमजोर मानसिकता का परिचायक है या समय की मांग? हम अपने ही हाथों अपनी भाषा का गला घोटने पर क्यों आमादा रहते हैं?

क्या हमारी भाषा (हिन्दी) इतनी दुर्बल है? दरिद्र या फिर गुलाम है? कल तक तो (आजादी पाने तक) हम, “हिन्दी है हम वतन के हिन्दोस्ता हमारा, सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा।” के गीत गाते रहे।

हर साल की तरह इस वर्ष भी ‘हिन्दी दिवस’ मनाया जा रहा है। इसी दिन तो हिन्दी के गुणगान होते हैं। हिन्दी कुछ दिनों तक पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियों में रहेगी। चर्चाएं होगी। लेख-आलेख छपेंगे। विद्वानों, राजनेताओं तथा हिन्दी प्रेमियों के वक्तव्य आयेंगे। और फिर कुछ दिनों के बाद सब शांत। फिर वही खामोशी। सवालिया खामोशी (?)।

लेखक -वीरेन्द्र नारायण झा