हिन्दी के साम्राज्य पर अंग्रेजी का कब्जा क्यों
भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार के लगभग पांच दशक बीत रहे हैं पर दुर्भाग्यवश राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का प्रयोग राजभाषा के रूप में नहीं किया जा रहा है। अंग्रेजी का प्रयोग अंग्रेजों के शासनकाल से भी बढ़कर चल रहा है। सम्पर्क भाषा का कार्य भी अंग्रेजी से ही लिया जा रहा है। स्वराज की भाषा तो राष्ट्र की ही भाषा होनी चाहिए। राज-शासन तो जनता की बोली में ही चलना चाहिए।
अंग्रेजी शासकों की जगह भारतीय शासक स्वाधीन भारत में विदेशी भाषा तथा अंग्रेज हुक्मरानों की भाषा का प्रयोग करके भारतीय राष्ट्रीयता, आत्म गौरव तथा आत्म-सम्मान का विश्व के बाजार से विधिवत अपमान कर रहे हैं। विश्व के सभी स्वतंत्र राष्ट्र अपनी ही राष्ट्रभाषा का प्रयोग करने में राष्ट्र के गौरव एवं स्वाभिमान का अनुभव करते हैं। अविकसित राष्ट्र भी अपनी ही भाषा का अनिवार्यत:पूर्वक प्रयोग करते हैं। एक सौ एक से भी अधिक गुटनिरपेक्ष राष्ट्र हर तरह अपने ही पैरों पर खड़े रहने का प्रयास कर रहे हैं।
स्वाभिमान के साथ आत्मनिर्भर बनने की जबरदस्त कोशिश कर रहे हैं। जर्मनी, फ्रांस, चीन, जापान, इटली, ईरान, स्पेन, तुर्की तथा आयरलैंड आदि देशों ने अपने ही राष्ट्र की भाषा को स्वीकारा है और विज्ञान तथा तकनीकी विज्ञान में भी आशातीत प्रगति की है। पर भारत में भारतीय भाषाओं में कार्य किया जाना हास्यास्पद एवं लज्जास्पद ही है। भारतीय चाहें तो उनसे भी आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन गुलामी ही की मनोवृत्ति के दुष्परिणामस्वरूप ऐसा नहीं हो पा रहा है। जब सबको भगवान सद्बुद्धि देगा तभी यह कार्य पूरा हो सकता है।
समस्त राष्ट्र में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करना अनिवार्य है। सारा देश आज स्वार्थों से घिरा हुआ है। हिंसाचार, स्वार्थाचार, अनाचार, अत्याचार तथा असत्याचार का नंगा नाच चल रहा है। देश भारी संकट से गुजर रहा है। दुर्भाग्यवश राष्ट्र के हितों की रक्षा करने एवं राजभाषा के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए सद्-प्रयत्न करना अनिवार्य हो गया है।
स्वार्थी राजनेताओं की गलत भाषा नीति के कारण राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का प्रयोग संविधान के अनुसार नहीं हो पा रहा है। देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि राजभाषा के साथ मजाक तथा खिलवाड़ किया जा रहा है! राष्ट्रीय जीवन में राष्ट्र भाषा हिंदी का प्रयोग सहर्ष तीव्र गति के साथ होना चाहिए। हिंदी तथा अहिन्दी प्रदेशों की सरकारें शासन का सारा कारोबार अपनी-अपनी ही राजभाषा में करें और केंद्र के साथ अंतरराष्ट्रीय पत्र व्यवहार के लिए राजभाषा हिंदी का प्रयोग करें।
संविधान के शिल्पकार डा. बी. आर. अम्बेडकर ने संपूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने तथा राष्ट्र का शासन पूरे लोकतंत्रात्मक पद्धति से चलाने के लिए भारतीय जनभाषा हिंदी का प्रयोग करने का अधिकार दिया। हिंदी तथा अहिन्दी राष्ट्रभक्तों ने हिंदी को राजभाषा का स्थान दिलाया है और हिंदी-राष्ट्र नेताओं ही ने हिंदी को राष्ट्रीय गौरव प्रदान किया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी ने हिंदी को राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम का माध्यम बनाया था और राष्ट्रीयता का महान प्रतीक स्वीकारा था। दक्षिण भारत में हिंदी को राष्ट्रीयता की भावना के साथ प्रचार व प्रसार किया था। रचनात्मक कार्यरूपों को प्रमुख स्थान दिया था। “एक हृदय हो भारत जननी” का महामंत्र उद्घोषित किया था।
दक्षिण भारत के मुख्यमंत्रियों ने त्रिभाषा सूत्र का पालन करना छोड़ देने के मार्ग का अनुगमन किया है। आज राष्ट्र के हितों के स्थान पर राज्य के हितों को सर्वोच्च समझने का राष्ट्रीय अपराध करते जा रहे हैं। राष्ट्र के सभी धर्माचार्यों, धर्म संस्थापकों, धर्मगुरुओं, धर्मप्रचारकों तथा धर्मानुयायियों ने राष्ट्र के लिए एक लोकभाषा को स्वीकार करने का अमर संदेश दिया है। हिन्दुओं, मुसलमानों, बौद्धों, जैनों, सिंधियों, सूफियों, पादरियों, अंग्रेजी विद्वानों, पिछड़े वर्गों, दलितों आदि ने हिंदी भाषा साहित्य, धर्म, संस्कृति व कला के विकास में योगदान दिया है। अतः हिंदी मानव समाज की भाषा है। मानवता की भाषा है। हिंदी भारतीय जनता के लोकमानस की भाषा है। साधुओं, मुनियों, ऋषियों, सूफियों, संतों, कवियों, राष्ट्र प्रेमियों, वीरों, त्यागियों, समाज सेवियों आदि ने हिंदी के पौधे को अपने खून से सींचा है।
प्रधानमंत्री स्व. श्री लालबहादुर शास्त्री, भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मोरारजी भाई देसाई भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. चरण सिंह तथा विश्वप्रियदर्शिनी भू.पू. प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी तथा भू.पू. युवा प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी जो हिंदी के प्रबल समर्थक थे। सभी हिंदी को राजभाषा को संवैधानिक स्थान दिलाना चाहते थे। फिर भी वे सब हिंदी को पूर्ण रूप से राजभाषा नहीं बना सके। युवा प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी हिंदी के प्रयोग पर जोर देने का जबरदस्त साहस व भगीरथ प्रयत्न करते रहे हैं। फिर भी आज राष्ट्रीय जीवन में राजभाषा हिंदी को न्यायोचित स्थान नहीं दिलाया जा रहा है। यह राष्ट्र का बड़ा दुर्भाग्य ही है।
लेखक – ‘बसवरत्न’ डा. शंकर राव कप्पीकेरी
(स्वतंत्रता संग्राम सेनानी)




