4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

हिंदी पाठक वर्ग का संकट: साहित्य, पुस्तक मेले और लेखक-प्रकाशक संबंधों पर सवाल

हिंदी में पाठक वर्ग विकसित नहीं हो पाया है, यह रचनात्मक साहित्य के बारे में सच है। घटिया लेखन के पाठक तो बहुत हैं। जब मैं अमेरिका गया तो मैंने जानने की कोशिश की थी कि वहां कविता की पुस्तक कितनी बिकती है। मुझे पता चला कि वह तीन हजार से ज्यादा नहीं बिक पाती। कमोवेश यही हालत हमारे यहां है। सोवियत संघ में मैंने कविता की पुस्तक की लाखों प्रतियां बिकती देखी हैं। एक ओर वह तथाकथित खुली दुनिया है जहां हर तरह की सुविधा मौजूद है, फिर भी पुस्तक नहीं बिक पाती। दूसरी ओर रूस में लाखों प्रतियां बिक सकती हैं। वहां एक कवि मात्र कविता लिखकर ही रह सकता है।

हिंदी में पाठक वर्ग शहरों में सिकुड़कर रह गया है। बहुसंख्यक ग्रामीण जनसमुदाय को शहरी पाठक वर्ग से काट दिया गया है। इससे पाठक वर्ग खंडित हुआ है। इसके पीछे साक्षरता की बहुत बड़ी भूमिका है। पाठकीय चेतना का संबंध सामान्य चेतना से भी है। यह राजनीतिक संघर्ष से पैदा होती है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि बिहार में सबसे अधिक हिंदी की पुस्तकें बिकती हैं, क्योंकि वहां राजनीतिक संघर्ष की परंपरा है।

पुस्तक मेले प्रकाशन की स्थिति और पाठक की चेतना को विकसित करने में कोई अहम भूमिका निभा सकते हैं, इसके बारे में संदेह है। आप दिल्ली जैसे महानगर में मेला कर लें, इससे प्रकाशक को लाभ मिल जाए, यह तो संभव है, पर हिंदी के पाठक वर्ग को इस मेले से जोड़ना संभव नहीं है। अगर पुस्तक मेला करना ही हो तो उसका विकेंद्रीकरण हो। मेले कई हों। छोटे-छोटे कस्बों में हों।

प्रकाशक-लेखक संबंध प्रेमियों के कलह की तरह है। यह संबंध शोचनीय अवस्था में है। सामान्यतः अनुभव यही है कि लेखक इस अमूर्त व्यवस्था में ठगे जाने और शोषित होने के लिए अभिशप्त है। लेखक को कुरेदा तो वह इस रग को छूना नहीं चाहता। मुझे लगता है कि लेखक की निजी प्रकाशकों के भरोसे यही परिणति होनी थी। प्रकाशक-लेखक संबंध जैसे-तैसे चलने वाला संबंध है। उसमें बुनियादी बदलाव की जरूरत है। आजादी के पहले प्रकाशकों में एक मिशनरी भावना थी। पर आजकल वे विशुद्ध व्यवसायी हो गए हैं। यह व्यवसाय पूंजीवादी तंत्र के अनुसार चलता है और वह उतना ही क्रूर होता है जितना कि यह तंत्र है। लेखकों के सरकारी संघ बनें तो शायद कुछ हद तक लेखकों के हितों की भी रक्षा हो पाए।

केदारनाथ सिंह
(कवि-प्राध्यापक)