
दुर्लभ पांडुलिपियों की खाक छानकर बनी एक अनमोल लाइब्रेरी
मृत्यु शय्या पर पड़े हुए एक पिता ने अपने पुत्र को बुलाकर चौदह सौ किताबें सौंपते हुए कहा-बेटा, मेरी आखिरी ख्वाहिश है कि तुम किसी तरह किताबें जमाकर लोगों के लिए एक शानदार लायब्रेरी बनवाओ ताकि मुल्क के लोग और-शिक्षित हो सकें। बेटे ने बाप की बात मान ली और उसने अपने वालिद का सपना पूरा किया। आज उपभोक्ता वस्तुओं के संग्रहण के दौर में भले ही यह कहानी दुहराई जा रही हो पर बिहार के छपरा जिले में दो अगस्त 1842 में जन्मे खुदा बख्श खां ने वह काम कर दिखाया जो आज दुनिया में एक मिसाल बन चुकी है।
पेशे से वकील खुदा बख्श खाँ ने अपने पिता मोहम्मद बख्श से, जो गालिब के समकालीन और अरबी, फारसी के माने हुए उस्ताद और वकील थे, ये किताबें हासिल की और 32 वर्षों तक दुर्लभ किताबों और पांडुलिपियों की खाक छानकर इस लायब्रेरी की बुनियाद रखी। आज यह इस्लामी साहित्य की पांडुलिपियों की दृष्टि से एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी है और देश-विदेश से लोग यहाँ अनुसंधान करने आते हैं।
पिछले दिनों इस अनमोल लायब्रेरी का शताब्दी समारोह मनाया गया जिसका समापन हाल ही में राजधानी में आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी से हुआ। भारतीय धर्मों के बारे मंस इस संगोष्ठी में उद्घाटन भाषण राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा ने किया। इस मौके पर दुर्लभ पुस्तकों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई जिसका उद्घाटन भी राष्ट्रपति डा. शर्मा ने किया।
लायब्रेरी के निदेशक के अनुसार आज लायब्रेरी में करीब तीन लाख पुस्तकें और 20 हजार दुर्लभ पांडुलिपियां हैं। इनमें कई ऐसी पांडुलिपियाँ हैं जो दुनिया में कहीं भी उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा चीन, मध्य एशिया, ईरान और अपने देश के कई दुर्लभ चित्र भी हैं। इस तरह यह लायब्रेरी राष्ट्र की अमूल्य धरोहर बन चुकी है।
इतना ही नहीं यह देश की एकमात्र ऐसी लायब्रेरी है जिसे सात विश्वविद्यालयों ने अनुसंधान केंद्र के रूप में मान्यता दी है और अब इस लायब्रेरी ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के समान फेलोशिप भी देना शुरू कर दिया है। साथ ही खुदा बख्श खाँ के नाम पर एक लाख रुपए का पुरस्कार भी देना शुरू कर दिया गया है। पहला पुरस्कार सुप्रसिद्ध इतिहासकार, स्वतंत्रता सेनानी और ओड़ीसी के पूर्व राज्यपाल बी. एन. पाण्डे को मिल चुका है।
लायब्रेरी के राष्ट्रीय महत्व को देखते हुए 1969 में केंद्र सरकार ने एक कानून पारित कर इसे अपने हाथों में ले लिया। इससे पहले यह राज्य सरकार के अधीन थी। अब एक बारह सदस्यीय स्वायत्त बोर्ड इसे चलाता है और राज्यपाल इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं। उर्दू के जाने-माने आलोचक कलीमुद्दीन अहमद इसके पहले निदेशक रह चुके हैं। इस ऐतिहासिक लायब्रेरी को केंद्र सरकार हर साल मात्र 70 लाख रुपए का अनुदान देती है।
लायब्रेरी का पुराना इतिहास बताता है कि खुदाबख्श खां ने पिता के इंतकाल के 16 वर्षों बाद 1891 में इस सार्वजनिक लायब्रेरी की स्थापना की। उस समय करीब 4000 दुर्लभ पांडुलिपियां थीं। एक अनुमान के अनुसार तब उनकी कुल कीमत ढाई लाख रुपए थी। इसके अलावा लायब्रेरी में एक लाख रुपए की अंग्रेजी की पुस्तकें थीं और 80 हजार रुपए इसकी इमारत बनवाने में खर्च किए गए थे। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि खुदाबख्श खाँ में तालीम हासिल करने की कितनी पिपासा थी और वह मुल्क के लोगों को भी इससे वाकिफ कराना चाहते थे। डिप्टी इंस्पेक्टर आफ स्कूल के रूप में नौकरी शुरू करने वाले खुदाबख्श खाँ 1895 में निजाम हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। 1903 में अंग्रेज सरकार ने उन्हें 200 रुपए की तनख्वाह पर इस लायब्रेरी का सचिव नियुक्त किया और कर्ज चुकाने के लिए 8000 रुपए दिए। 1903 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन इस लायब्रेरी की शोहरत सुनकर इसे देखने आए और उन्होंने इसमें काफी रुचि ली। जिसके कारण वाचनालय बना और इसके पुस्तकों की एक सूची तैयार हुई। खुदाबख्श खाँ की शख्सियत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सर जदुनाथ सरकार जैसे मशहूर इतिहासकार ने उनके निधन के एक महीने बाद सितंबर 1908 में मॉडर्न रिव्यू में इस लायब्रेरी और खुदाबख्श खाँ के बारे में एक विस्तृत लेख लिखकर लोगों को इस विरासत की तरफ ध्यान दिलाया। 1925 में महात्मा गांधी भी इस लायब्रेरी को देखने आए और उन्होंने यह उद्गार व्यक्त किया कि मैं इस लायब्रेरी के संस्थापक की स्मृति को बड़े आदर से याद करता हूँ जिन्होंने भारत में ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियों का संग्रह करने के लिए न तो पैसे और न ही किसी प्रकार की तकलीफ की परवाह की।
अगर कपिलदेव और इमरान खाँ, लता मंगेशकर और मेहदी हसन को दो मजहबों की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जा सकता है तो खुदा बख्श खाँ को क्यों नहीं जिन्होंने न केवल इस्लाम बल्कि हिंदू धर्म से भी संबंधित कई उर्दू पुस्तकों का संग्रह किया है।
आज इस लायब्रेरी में मोतीलाल नेहरू, तेज बहादुर सप्रू, लाला लाजपत राय जैसे कई राष्ट्रीय नेताओं की उर्दू में लिखी गई चीजें सहेज कर रखी गई हैं। 1947 तक उर्दू में हिंदू धर्म से संबंधित करीब तीन हजार पुस्तकें थीं जिनमें से कई आज भी लायब्रेरी में देखी जा सकती हैं पर भारत-पाक विभाजन के नासूर के कारण आजादी के बाद इस तरह के कामों की गति काफी धीमी पड़ गई। लायब्रेरी में चौदहवीं सदी के फारसी शायर हाफिज की पुस्तक दीवाने हाफिज भी है जिस पर हुमायूँ, शाहजहाँ और जहाँगीर के दस्तखत हैं। इसके अलावा अकबर के जमाने में अबुलफजल और फैजी द्वारा किए गए महाभारत और गीता के भी उर्दू अनुवाद है। तैमूरलंग से लेकर अकबर तक के खानदान का इतिहास तारीखे खानदान, तैमूरिया, नामक एक अत्यंत महत्वपूर्ण किताब भी इस लायब्रेरी में है। इसे अकबर ने लिखवाया था। ग्यारहवीं सदी में कश्मीर के बादशाह ने गीता और महाभारत का फारसी अनुवाद कराया था जिसकी पांडुलिपि यहाँ देखी जा सकती है। इसके अलावा अकबर के जमाने में रामायण के फारसी अनुवाद की भी प्रति इस लायब्रेरी में है।
अब तक उर्दू में रामायण के 300, गीता के 260 और महाभारत के 70 अनुवाद हो चुके हैं। लायब्रेरी में गालिब के हाथ की लिखी दीवानेगालिब की कॉपी भी है जो इसके अलावा कहीं नहीं है। इसके अलावा मीर, जौक, जफर, दाग आदि की भी पांडुलिपियाँ यहाँ है। लायब्रेरी में शाहजहाँ को अली मरदान खान द्वारा सौंपे गए शाहनामा की खूबसूरत काफी भी है। शल्य चिकित्सा के बारे में जाहरवीं की 584 हिज्री की पांडुलिपि और हारुनउल रशीद के जमाने में डियोसकोराइड्स की अरबी में अनूदित मेडिकल प्लांट्स की पांडुलिपि भी है। लायब्रेरी में शेरो शायरी की 400 से ऊपर पांडुलिपियाँ हैं। इसके अतिरिक्त कानून पर लिखी गई दुर्लभ पुस्तकें भी हैं। साथ ही पुरानी पत्रिकाओं की फाइलें भी हैं जिनमें कई पत्रिकाओं को दोबारा छापा गया है। लायब्रेरी की कुल किताबों और पांडुलिपियों आदि की सूची 36 खंड में छपी है।
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