
कुलपतियों के लिए आचार संहिता
आज के हालात में, जो लोग विश्वविद्यालय और कालेज शिक्षकों की कृति शून्यताको लेकर प्रायः चिन्तित रहते हैं वे यह सवाल उठाते हैं कि क्या शिक्षकों के लिए कोई आचार संहिता नहीं हो सकती? मामले की हकीकत यह है कि एक ऐसी संहिता पहले से ही है। वेतनमान में पिछली बार 1987 में संशोधन हुआ था तब शिक्षकों के संगठन (ए. आई. पी. यू. टी. ओ.) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के बीच एक संहिता तय हुई थी। यह एक अलग सवाल है कि उसे लागू किस हद तक किया गया। कुछ समय पूर्व जब मैंने उक्त संगठन की कार्यसमिति के एक सदस्य से इस मुद्दे के बारे में पूछा तो वह आश्चर्यचकित रह गया। उसने पहले इस बारे में कुछ सुना भी नहीं था।
इसके अलावा एक मुद्दा जो ज्यादातर शिक्षक उठाते हैं वह यह है कि सभी शिक्षकों के लिए आचार संहिता की बात करते हैं किन्तु कुलपतियों के लिए आचार संहिता के बारे में क्या है? उनकी बात में सार है। कुलपतियों के लिए भी संहिता होनी चाहिए। उनमें से अनेक ऐसे ढंग से काम करते हैं जिसे लेकर सवाल उठ सकते हैं। काफी हद तक समस्या इस तथ्य से खड़ी होती है कि उनमें से अधिसंख्य की नियुक्तियां राजनीति की देन होती है। वे इसलिए नियुक्त नहीं किये जाते कि वे उस पद के योग्य हैं अपितु इसलिए यह पद पा जाते हैं कि उनकी राजनीतिज्ञों तक पहुँच होती है। कम से कम वे जो सत्तासीन हो उसे ‘स्वीकार्य’ तो हों ही। ऐसा होने के कारण कुलपतियों के लिए आचार संहिता की बात ऐसी हो जाती है कि जिस सवाल का जवाब नहीं दिया जा सकता।
विश्वविद्यालय में संकाय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जबकि सामान्य तौर पर कहा जाय तो कुलपति तो आते जाते रहते हैं। ज्यादातर मामलों में उनकी नियुक्ति तीन वर्ष के लिए होती है। हालाँकि कुछ के मामलों में यह अवधि चार-पांच वर्ष तक की भी हो जाती है। अतएव इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जो लोग 3-5 वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त होते हैं वे अपना व्यवहार एक आचार संहिता के अनुसार रखें।
मैं 1994-95 में उस समिति का प्रमुख था, जिसका गठन आन्ध्र प्रदेश में दस विश्वविद्यालयों के कामकाज की समीक्षा के लिए किया गया था हमने अपनी रिपोर्ट में निम्नलिखित सुझाव दिये।
(1) कुलपति से मात्र अधिनियम कानूनों और अध्यादेशों और नियमों पर ध्यान देने की ही अपेक्षा नहीं है, उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका पूर्ण रूपेण सम्मान और क्रियान्वयन हो।
(2) विश्वविद्यालय के मुख्य कार्यकारी के रूप में उसका कार्य निष्पक्ष और उचित तो हो ही अपितु यह भी जरूरी है कि वह ऐसा दिखायी भी दे। दूसरे शब्दों में यह कि वह जो कुछ भी करता है वह खुला और पारदर्शी हो।
(3) सामान्य तौर पर कहा जाय तो यह कि कुलपति से यह आशा की जाती है कि वह विश्वविद्यालय को उससे बेहतर हालत में छोड़े जो कि तब थी, जब उसने पद संभाला था। यह स्थिति उसके छात्रों और शिक्षकों के क्रियाकलाप तथा संकाय की सुदृढ़ता एवं स्तर में सुधार नवीनतायुक्त कार्यक्रमों और छात्र सेवाओं से भी व्यक्त होनी चाहिए।
(4) हर विश्वविद्यालय की एक सार्वजनिक छवि है। कुलपति का यह सतत प्रयास होना चाहिए कि उस सार्वजनिक छवि में सुधार हो। इस उद्देश्य से, आज की परिस्थिति में उद्योग के साथ अन्तः क्रिया खास तौर पर महत्वपूर्ण है।
(5) जनता अथवा अन्य स्रोतों से कोषों को बढ़ाना भी उसके काम का एक महत्वपूर्ण भाग है। जैसा कि लगेगा यह सभी कुछ हानिरहित ही है। सामान्यतः इससे अलग कुछ नहीं। यह तो तभी स्पष्ट हो पाता है कि किसी कुलपति का आचरण संहिता के अनुरूप रहा है या नहीं जब उसके आचरण की जांच की कसौटी पर उनमें से कई खरे नहीं उतरेंगे। इसे ही विनम्रता सहित यों भी कहा जा सकता है कि उनके क्रियाकलापों में से बहुत से ऐसे होते हैं कि जिन्हें छिपाया जाता है।
इस तथ्य को मान्यता देते हुए इस मुद्दे पर एक और अनुशंसा का उल्लेख भी महत्वपूर्ण होगा। हमारे सामने अनेक ऐसे मामले आये, जिनमें एक दशक से भी बैंक निपटारे किये ही नहीं गये। एक खास विश्वविद्यालय में इस काम के लिए एक अलग प्रकोष्ठ था। हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उसे समाप्त कर दिया गया और ऐसा होने का कारण यह था कि कोई बैंक निपटान किया ही नहीं गया। हमने पूछा कि किसके कहने पर ऐसा हुआ तो कोई सम्मानजनक उत्तर नहीं मिला। हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि राज्य सरकार ने भी यह सुनिश्चित करने पर कभी विशेष ध्यान नहीं दिया कि जो राशियाँ दी गयीं वे सावधानी के साथ और उचित रूप से खर्च की गयी हैं या नहीं।
इस सिलसिले में हमने एक अन्य सिफारिश भी की। कई मामलों में आडिट की आपत्तियों का निवारण, उनके उठाये जाने के एक दशक बाद तक भी नहीं किया गया। ऐसी जो विसंगतियां हुई उन पर कोई सफाई तो थी ही नहीं। स्थिति यह भी थी कि जिन लोगों ने वह सब कुछ किया था उनमें से आधे या तो अवकाश ग्रहण कर चुके थे अथवा कार्यालय से अन्यत्र जा चुके थे। कुछ ऐसे भी लोग थे कि जिनका देहान्त हो गया था। ऐसी समस्याओं से कैसे निपटा जा सकता है?
हमारी राय यह थी कि किसी कुलपति के रिटायर होने से पहले, और यह तारीख तो निश्चय ही पहले से पता होती है, विश्वविद्यालय वित्तीय स्थिति के बारे में विशेष आडिट होना चाहिए। यदि उसने कोई अनाधिकृत खर्च मंजूर किया है अथवा वह अनुचित और अनापशनाप खर्च में लिप्त रहा है तो उसे यह स्पष्टीकरण देना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों किया। जब कोई रिटायर हो जाये या अन्यत्र चला जाय तो ऐसे सवालों के पूछ जाने में कोई सार नहीं रह जाता।
इस प्रक्रिया का अनुपालन कर पाने में कोई कठिनाई नहीं आनी चाहिए। राज्य को जो कुछ करना होगा वह यह कि एक प्रक्रिया तय कर उसे क्रियान्वित किया जाय। हमारा मनोविज्ञान यह है कि जब भावनाएँ उभार दी जाय और मामलों में गर्मी आ जाये तभी कारवाई हो सकती है। परन्तु जब गर्मी ठण्डी पड़ जाय तो गबन जैसे मामलों में भी स्पष्टीकरण दिया जा सकता है।
इनमें से कुछ बातों को कहने की जरूरत नहीं पड़ती किन्तु इस हकीकत को ध्यान में रखकर कि इस गरिमापूर्ण पदपर जो नामांकित होते हैं, उनमें से अनेक ऐसे हैं जो कि बहुत सी अपेक्षाएं पूरी नहीं कर पाते। उनके लिए एक आचार संहिता जिसका स्वरूप स्वैच्छिक होना ही अपेक्षित है और व्यय पर आज की तुलना में और अधिक कड़ा नियंत्रण जरूरी है। ऐसा होने से हालात में काफी सुधार हो सकेगा।
लेखक – डा. अमरीक सिंह


