4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

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विश्वविद्यालयों की उपयोगिता की परीक्षा

जब कभी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय विश्वविद्यालय व्यवस्था की प्रगति व महत्व की चर्चा होती है तो हम अधिकांशतः बीते हुए इन सैंतालीस वर्षों में विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों की संख्यात्मक वृद्धि, कर्मचारियों व शिक्षकों के वेतनमानों में वृद्धि, दूरगामी शिक्षा का मुक्त विश्वविद्यालयों से प्रसार, महिलाओं की उच्च शिक्षा में वृद्धि व उच्च शिक्षा की संस्थाओं में अनुसूचित जाति व जनजाति के विद्यार्थियों के लिए आरक्षण व्यवस्था को लागू करना मानते हैं। विकास का अर्थ, मात्र किसी भी प्रयोग के क्रियान्वयन से नहीं है बल्कि इसका अर्थ है कि क्रियान्वयन जिम्मेदारी से निभाया जाना जिससे कि स्तर बरकरार रह सके। क्या भारतीय विश्वविद्यालय व्यवस्था इस मापदंड पर खरी उतरती है? क्या हमारे देश के विश्वविद्यालय अपने सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्व को भली-भांति निभा रहे हैं?

प्रतिष्ठित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय परिसर आज जंग का मैदान बन चुका है। राजधानी के दिल्ली व जामिया मिलिया विश्वविद्यालय भी आर्थिक मकड़जाल व राजनीति के चक्रव्यूह में फंस चुके हैं। एक समय का अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बनारस हिंदू विश्वविद्यालय भी आज अपने गौरवपूर्ण अतीत को स्मरण कर रहा है। इसके अलावा पूरब का आक्सफोर्ड कहा जाने वाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय अध्ययन-अध्यापन का केंद्र न रह कर राजनीति का अड्डा बन चुका है। जब देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की यह दुखद स्थिति है तो राज्य सरकार के अधीन देश के विश्वविद्यालयों की स्थिति का अनुमान सहजता से ही लगाया जा सकता है। एक अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ रहा है हमारे विश्वविद्यालयों को, जहां जातिवाद, आतंकवाद, आर्थिक घोटाले व प्रतिभा का हनन तेजी से पैर पसार रहे हैं। क्या इस दुर्दशा को सुधारने की किसी को चिंता है? क्या विश्वविद्यालय का अस्तित्व केवल परीक्षा व्यवस्था पर केंद्रित है? इस ओर ध्यान देना आज बुद्धिजीवियों की प्राथमिकता होनी चाहिए।

अभी कुछ माह पूर्व मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति पद को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक रोचक विवाद उत्पन्न हुआ था जिसकी गूंज लोकसभा में भी सुनी गई थी। एक ऐसे 35 वर्षीय व्यक्ति को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस विश्वविद्यालय की बागडोर सौंपी गई जिसे न तो एक भी दिन का प्रशासनिक अनुभव ही था और न ही शिक्षण कार्य का अनुभव। देश के अल्पशिक्षित व अशिक्षित राजनेताओं के हाथ में उच्च शिक्षा की बागडोर का ही परिणाम है कि देश के विश्वविद्यालयों को छोटे शैक्षणिक कद वाले व प्रशासनिक दृष्टि से अक्षम कुलपति मिल रहे हैं। कुलपति पद प्राप्त करने के लिए अब राजनैतिक खुशामद, अर्थबल का प्रयोग व अन्य दबाव चलते हैं। समस्या की जड़ यहां मौजूद है। विचारणीय पहलू है कि अब देश को सर जादूनाथ सरकार, आशुतोष मुखर्जी व सरूप सिंह जैसे कुलपति क्यों नहीं मिलते हैं।

क्या देश में प्रतिभावान शिक्षाविदों की कमी है या फिर उनका चयन करने वाले सही चयन नहीं कर पाते हैं। वास्तव में आज भी देश में सच्चरित्र, भरपूर शैक्षणिक योग्यता व प्रशासनिक क्षमता के व्यक्तित्व मौजूद हैं, पर हाशिए पर। इसके अलावा आज भी देश के चुनिंदा विश्वविद्यालयों में योग्य कुलपति के कारण ही स्तर बरकरार रह पाता है। पर आवश्यक पहलू आज यह है कि कुलपति के चयन की प्रक्रिया में आमूल परिवर्तन हो। राज्य सरकारों के अधीन विश्वविद्यालयों में तो शीघ्रातिशीघ्र ये परिवर्तन लाए जाएं।

कुलपति पद के लिए कुछ न्यूनतम योग्यताएं आवश्यक हैं। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि साधारण से साधारण पद के लिए भी कुछ न्यूनतम योग्यताएं निर्धारित की गई हैं पर कुलपति जैसे शीर्ष पद के लिए कोई आवश्यक योग्यता नहीं है। यही कारण है कि आज सांसद या विधायक टिकट के दावेदार इधर हताश होकर कुलपति पद प्राप्त करने के लिए दौड़-धूप करते देखे जा सकते हैं। राज्य सरकारों के अधीन विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति उस राज्य का राज्यपाल होता है। क्या राज्यपाल कुलाधिपति के पद के साथ न्याय कर पाता है? इस ओर संभवतः हम यदा-कदा ही चिंतन करते हैं। विश्वविद्यालय व्यवस्था की अनुभवहीनता व राज्यपाल पद की अत्यधिक व्यस्तता की वजह से विश्वविद्यालय स्वयं को उपेक्षित सा महसूस करते हैं। कुलाधिपति पद आज विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता तक सीमित रह गया है। यही कारण है कि विश्वविद्यालयों की मूलभूत समस्याओं के परिचय से कुलाधिपति वंचित रह जाते हैं। इसलिए कुलाधिपति व कुलपति पद के कार्यकलापों की ठोस समीक्षा की जाए। कुलपति का ही कार्य क्षेत्र बढ़ा कर उसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रति उत्तरदायी ठहराया जाए।

विश्वविद्यालयों के इस हश्र के लिए यह तय कर पाना अब अत्यधिक जटिल कार्य है कि विश्वविद्यालय से जुड़े वर्गों में सर्वाधिक जिम्मेदार कौन है? क्या विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों को योग्य, कर्तव्यनिष्ठा से पूर्ण उच्च स्तर के शोध कार्य की मानसिकता के शिक्षक मिल रहे हैं? आज तो शिक्षण कार्य की टीस व इच्छा से रहित अच्छे वेतनमानों व न्यून कार्य वाला व्यवसाय मानते हुए शिक्षक इस पद की ओर आकर्षित होते हैं। महाविद्यालयों से जुड़े शिक्षकों की स्थिति बहुत विकट है। वर्ष भर में सौ से भी कम कार्य दिवसों की स्थिति में शिक्षक व विद्यार्थी के बीच दूरी बढ़ चुकी है। पाठ्यक्रम पूरे नहीं हो पाते हैं। शिक्षक स्वयं को व्यस्त नहीं पाता है। इसी कारण वह ट्यूशन का व्यापार, निजी व्यवसाय व राजनीति की ओर आकर्षित होता है। यही नहीं शिक्षक महाविद्यालय में शिक्षण कार्य को ‘पार्ट टाइम’ व्यवसाय की संज्ञा देते हैं व अन्य दूसरे कार्यों में लिप्त देखे जा सकते हैं। विश्वविद्यालयों के विभिन्न शिक्षण विभागों को उच्चतम शिक्षण के प्रति समर्पित शिक्षक न्यून प्रतिशत से ही प्राप्त हो रहे हैं।

अन्य सभी बेहतर व्यवसायों के प्रयासों की विफलता के बाद ही वे शिक्षक विश्वविद्यालयों की ओर आ रहे हैं जो शिक्षण कार्य में रूचि नहीं लेते हैं। यही कारण है कि अब नौजवान शिक्षकों में अपने विभागाध्यक्ष व अन्य वरिष्ठ शिक्षकों से कोई तालमेल नहीं रह पाता है। इसके अलावा शैक्षिक विभाग में अपनी नियुक्ति के बाद अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने के लिए वे प्रयास करते हैं जिससे कि शिक्षक पद के अपने दायित्व को भली-भांति नहीं निभा पाते हैं। दूसरा पदोन्नति की लचीली व्यवस्था होने की स्थिति में आज शिक्षक निकम्मा बन चुका है। आज जो शिक्षक विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में प्रवक्ता बनता है वह नियुक्ति के कुछ वर्षों तक भारतीय प्रशासनिक सेवाओं, विदेश में शोध कार्य के लिए प्रवेश संबंधी व अन्य बेहतर सेवाओं के लिए प्रवेश परीक्षाएं देता है। इस प्रकार विश्वविद्यालयों को शिक्षक वह सब नहीं दे पाते हैं जो उनसे अपेक्षित है।

जो शिक्षक विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य में संलग्न हैं वे अपने विषय में हो रही नवीन जानकारियों से अनभिज्ञ हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विश्वविद्यालय के अनुदान में की जा रही कटौती की वजह से पुस्तकालय बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। यही कारण है कि उत्तम श्रेणी की पुस्तकों, शोधपत्रिकाओं व समाचार पत्र-पत्रिकाओं की संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है जिसकी वजह से शिक्षक अपने विषय की नवीन सूचनाओं के बिना विद्यार्थियों को व्याख्यान देता है। शिक्षक के शिक्षण कार्य, शोध पत्र प्रकाशन व सेमिनार आदि में भागीदारी के विषय में कोई नियम नहीं है। एक प्रकार से ठहराव-सा आ गया है शिक्षक की गतिविधियों में। इस दुर्दशा के सुधार के लिए व्यापक स्तर पर कार्य योजना की आवश्यकता है। आज हमको शिक्षकों की समस्याओं का खुले दिमाग से अध्ययन करना होगा, हाँ दोषी पाए गए शिक्षकों को कठोर सजा का प्रावधान लाना होगा। हमको यह नहीं भूलना चाहिए कि 60 के दशक तक भारतीय विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षक बहुसंख्या में मौजूद थे। फिर आज इनका अभाव क्यों?

एक दृष्टि विश्वविद्यालय व महाविद्यालय परिसरों पर डालने से राष्ट्रीय उच्च शिक्षा की कलई खुल जाती है। महाविद्यालयों में तो अध्ययन-अध्यापन का माहौल ही समाप्त हो रहा है। अधिकांश महाविद्यालयों की प्रबंध समितियों के पदाधिकारियों का उच्च शिक्षा से कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। वे या तो इन पदों को राजसत्ता प्राप्ति के लिए सीढ़ी मानते हैं या फिर अपनी जेबें भरने के इरादे से महाविद्यालयों की प्रबंध समिति पर काबिज रहते हैं। कई बार तो महाविद्यालय परिसर की भूमि तक को वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए बेच डालते हैं। क्या ऐसे पदाधिकारी महाविद्यालय के कल्याण में कुछ योगदान दे सकेंगे? यही स्थिति महाविद्यालय के प्राचार्य की भी है। जातिविशेष पर स्थापित अधिकांश महाविद्यालयों के प्राचार्य उसी जाति से संबंधित होने के कारण संकीर्ण विचारधारा से ओत-प्रोत रहते हैं।

अपने पद की सुरक्षाथ्र्व वे शिक्षकों व विद्यालयों के गुट बनाते हैं व राजनीति में लिप्त रहते हैं। प्रशासनिक दायित्व से दूर इस प्रकार के व्यक्तित्व महाविद्यालय की सेवार्थ कुछ भी नहीं कर पाते हैं। यही कारण है कि देश के हजारों ऐसे अविकसित महाविद्यालय हैं जहाँ आज भी मूलभूत सुविधाएं अनुपलब्ध हैं व शैक्षणिक व सांस्कृतिक गतिविधियां शून्य हैं। ब्रिटेन व अमेरिका के महाविद्यालय वहाँ के विश्वविद्यालयों के ही समान कार्य करते हैं व अपने स्तर को बनाए हुए हैं। क्या हम भी इस दिशा में कुछ सकारात्मक कर सकेंगे? विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवनों में तो आज भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। धन के बदले अंक सूची में हेराफेरी, नकली डिग्रियों का अवैध व्यापार, फर्जी शोध कार्य पर पी० एच० डी० व आर्थिक अनुपात को हड़पने के कई उदाहरण हमारे विश्वविद्यालयों में मौजूद हैं। इस बुराई से हमारे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भी अछूते नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम स्वयं अपने विश्वविद्यालयों की धरोहर को घुन की तरह से चाट रहे हों। विडंबना यह है कि यह सब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की आंखों के नीचे हो रहा है। दोषियों को सजा न मिल पाना दूसरे लोगों को भी इसमें लिप्त रहने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे में मुट्ठी भर कर्तव्यनिष्ठ विश्वविद्यालयकर्मी स्वयं को कुंठित व हताश पाते हैं।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि शिक्षा आर्थिक विकास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपादान है। अनुमानतः विकास दर का लगभग 85 प्रतिशत अच्छी शिक्षा का ही परिणाम होता है। ऐसे में हमारे देश की वर्तमान परिस्थितियों में तो विश्वविद्यालयों पर एक महत्वपूर्ण दायित्व आ जाता है कि वे देश को वर्तमान आर्थिक संकट से उबारने के लिए अपना ठोस योगदान दें। कुछ समय पूर्व ‘द वाल स्ट्रीट जर्नल’ के विश्वविद्यालय संबंधी सर्वेक्षण से साबित हो चुका है कि विश्व के अग्रणी प्रथम बीस विश्वविद्यालयों में किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय का स्थान नहीं है। ऐसे में हम यह कैसे उम्मीद लगा सकते हैं कि भारतीय उच्च शिक्षा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाए। प्रत्येक वर्ष मिलने वाले नोबेल पुरस्कारों की सूची में अधिकांशतः विश्वविद्यालय स्तर के शिक्षक ही होते हैं। स्वतंत्र भारत में उच्च-शिक्षा के महत्व को ठीक प्रकार से नहीं आंका गया है। आज यह देश की सर्वोच्च आवश्यकता बन कर उभरी है। विश्वविद्यालयों का पूर्णरूपेण कायापलट सर्वोच्च आवश्यकता है।

लेखक – अनिल राणा