
हिंदी पुस्तकें क्यों नहीं पढ़ी जातीं?
मनुष्य पुस्तक विमुख हो गया है। उसने पुस्तकों को आलमारी में अकेला छोड़ दिया है। पुस्तक निर्वासित और अकेलेपन की जिंदगी जी रही है। यूं तो पुस्तक सजीव और प्राणवाण होती है, लेकिन वह अन्य पदार्थों की तरह इसी मायने में निर्जीव होती है कि वह अपनी मुक्ति के लिए कोई पहल नहीं कर सकती है। मुक्ति का पथ आलोकित करने वाली पुस्तक अपनी मुक्ति के लिए अपने अध्येताओं की पहल पर निर्भर रहती है। मगर मनुष्य है कि वह ‘अतिगति का बंदा’ बना दौड़ रहा है। पुस्तकें अपठित रही जा रही हैं।
भवानी प्रसाद मिश्र ने ‘अतिगति के बंदे’ शीर्षक से जिस समाज को संबोधित करके अपनी कविता लिखी, उस समाज का एक नुमाइंदा जैनेंद्र के उपन्यास ‘दर्शक’ में है, जो रंजना से कहता है, ‘मेरे यहां भी किताबें हैं, पर मैं उन्हें पढ़ता नहीं हूँ। उनको रखने का शौक ही ठीक है। पढ़ना तो बिगाड़ दिया करता है। मैं भी कभी पढ़ता था। क्या हुआ उससे? एकदम कुछ नहीं हुआ। हुआ तब जब मैं ‘मैं’ बना। ‘मैं’ वह पुस्तक पढ़ कर नहीं बना, बल्कि ए वन स्मगलर बन कर बना। लगता है मुलायम सिंह यादव का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है। तभी उन्होंने पुस्तकों पर कर और उपकर लगा कर अपने प्रदेश की जनता को पुस्तक से दूर रखने का अभियान छेड़ा।
विडंबना का एक चेहरा यह भी है कि भारत में जब निरक्षरता का प्रतिशत अधिक था तो पुस्तकें अधिक पढ़ी जाती थीं। अब जब निरक्षरता का प्रतिशत दिनों दिन कम होने का दावा किया जा रहा है पुस्तकों की पठनीयता कम होती जा रही है। साक्षर हो रहे समाजों में अक्षर और पुस्तकों के प्रति बढ़ती उदासीनता हमारे समाज और उसके विकास के अंतर्विरोधों का रोचक पक्ष है। साक्षरता का तूफान खड़ा करने वाली सरकारें पुस्तकालय आंदोलन ठंडा कर चुकी हैं।
पुस्तक की मृत्यु केवल भारत में नहीं हो रही है। हालांकि दूसरी ओर अब यह बताया जाने लगा है कि पश्चिम में पुस्तक पुनर्जीवन प्राप्त कर रही है। इसीलिए भविष्यवाणियां की जा रही हैं कि भारत में भी पुस्तकों के पाठकों की फसल लहलहाएगी और पुस्तक और मनुष्य का याराना बहाल हो जाएगा। लेकिन सच इसके विपरीत है। बंगाल और केरल में भी पाठकों की संख्या ढलान पर है।
हिंदी क्षेत्र की स्थिति पहले से ही सूखी सरस्वती है। लेकिन यह सवाल बेताल की तरह फिर डाल पर है कि हिंदी प्रदेशों के लोग हिंदी की पुस्तकें क्यों नहीं पढ़ते? क्या यह कहा जा सकता है कि हिंदी प्रदेशों के लोगों में पढ़ने की रुचि नहीं है? हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या प्रतिदिन लगभग दो करोड़ है। हिंदी पत्रकारिता ने अभी वह स्थिति नहीं बनाई है कि गैर हिंदी भाषियों को हिंदी अखबार पढ़ने के लिए बाध्य करे।
जाहिर है कि हिंदी अखबार हिंदी प्रदेशों के लोगों द्वारा पढ़ा जा रहा है। तो क्या जो हिंदी अखबार पढ़ सकता है वह हिंदी पुस्तकें न पढ़ने का भाव स्थायी बनाए रख सकता है? या अखबार भी मनुष्य को पुस्तक से दूर रखने का काम करता है? हिंदी अखबार अपने पाठकों को पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करने का काम नहीं करता। हर हिंदी अखबार में पुस्तक समीक्षा के लिए स्थान है। हिंदी अखबारों में प्रकाशित पुस्तक समीक्षाओं को पढ़ कर कोई भी पाठक पुस्तक पढ़ने का साहस नहीं कर सकता!
अखबार को चाहिए कि वह अपने पाठकों को पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करे। इसके लिए पुस्तकों की समीक्षाएं विज्ञापन की पारदर्शी और ललक पैदा करने वाली भाषा में करनी चाहिए। किसी सीरियल के उस एपिसोड की तरह जो अगले एपिसोड के लिए ललक पैदा करे। लेकिन हिंदी अखबार ऐसा कुछ नहीं करता। जो करता है, उससे हिंदी पाठक अधिक बिदकता है।
यह स्पष्ट है कि हिंदी में पाठकों को पाने की संभावनाएं अनंत हैं। लेकिन सवाल है कि संभावनाओं को पेरे कौन? बाजार की संभावनाओं को पेरने का काम लेखकों का नहीं हो सकता। लेखक एक सीमित दायरे में ही पाठकों तक अपनी पहल से पहुंच सकते हैं। मगर आज पाठकों का संसार छोटा नहीं है, फैला हुआ है। लेखक स्वयं उन तक नहीं पहुंच सकता। बीच-बीच में लेखक की सीधे अपने पाठकों से जुड़ने की इच्छा सुनाई देती है। अपने पाठकों से सीधे जुड़ना अनुभवों की साझेदारी तक ही हो सकता है।
कुछ लेखक अपनी पुस्तकें भी अपने पाठकों तक पहुंचाने का उपक्रम करते हुए पाए जाते हैं। लेखकों के इस निजी प्रयास से कोई अहित तो नहीं होता लेकिन चूंकि पुस्तक भी एक उत्पाद है और उत्पाद को उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए एक मुकम्मल तंत्र चाहिए। लेकिन हिंदी पुस्तकों को पाठकों तक पहुंचाने का कोई सेवा संजाल नहीं है। निश्चित तौर से पुस्तक विपणन का काम अकेले प्रकाशक पर नहीं छोड़ा जा सकता।
प्रकाशक पुस्तक का उत्पादक हो सकता है मगर यह आवश्यक नहीं है कि पुस्तकों की मार्केटिंग भी करे। चूंकि वह स्वयं मार्केटिंग करता है, इसलिए वह सरकारी गलियारे से पुस्तकालय तक पहुंच कर संतुष्ट हो जाता है। वस्तुतः हिंदी पुस्तकों के प्रकाशकों को न तो अपने बाजार का सही-सही ज्ञान है और न ही मार्केटिंग की तमीज है। हिंदी की किसी पुस्तक का बाजार में कायदे से पदार्पण (लांच) भी नहीं किया जाता। हिंदी पुस्तकें बाजार में उतरती ही नहीं हैं। वह अपने मायका से चलती है तो ससुराल में उतरती है और ससुराल से उसकी अर्थी उठती है। मायका अगर प्रकाशकों का गोदाम है तो ससुराल सरकारी पुस्तकालय है।
हिंदी क्षेत्रों में हिंदी की पुस्तकें न पढ़े जाने के कारणों का जिक्र करते हुए अक्सर यह बताना नहीं भूला जाता कि हिंदी क्षेत्र के लोगों में हिंदी के प्रति कोई निष्ठा नहीं है। वे जो इससे असहमत होने का पवित्र भाव प्रकट करते हैं, वे ऐतिहासिक सच से मुखामुखम नहीं होना चाहते हैं। किसी मराठी, गुजराती या बंगाली की निष्ठा अपनी-अपनी भाषा से सीधी जुड़ी रहती है। वे घर और बाहर एक ही भाषा को बरतते हैं, जबकि हिंदी भाषियों की स्थिति इससे भिन्न है। हिंदी भाषी और हिंदी के दरम्यान बोलियां खड़ी हैं। हिंदी भाषी अधिकांश लोग अभी भी गांव में रहते हैं, बोलियों को बरतते हैं। अपनी बोली से ही अपनी पहचान बनाते हैं। वे जो शहर में डेरा डाले हैं, घर के बाहर हिंदी का व्यवहार करते हैं, घर लौटते ही अपनी बोली में उतर आते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश के लोग अपने क्षेत्र की बोली बोलते हैं तो राजधानी अपने क्षेत्र की बोलियां। हिंदी भाषी अधिकांश लोगों का मानसिक बोध संरचना बोलियों से बना होता है। मानसिक संरचना बोलियों से बनी हुई होने के कारण हिंदी की पुस्तकों के प्रति अपेक्षाकृत एक बड़ी आबादी का कोई आग्रह पैदा नहीं होता।
हिंदी के कई लेखकों-कवियों का ख्याल है कि बोलियों से जुड़ा रहना अपनी जड़ से जीवन रस पाते रहना है। यह एक तरह का व्यामोह है। बोलियों के सहयोग से हिंदी का स्वाद अवश्य निखारा जा सकता है, मगर बोलियों को बरतने की वकालत नहीं की जा सकती। आधुनिक समय में बोलियां हमें सींच नहीं सकतीं। क्या हिंदी को इस मोर्चे पर बोलियों से संघर्ष नहीं करना चाहिए? हिंदी आधुनिक काल की एक उपज है। आधुनिक काल की तमाम विकसित तकनीकों और उत्पादों ने अपनी पूर्ववर्ती तकनीकों और उत्पादों से संघर्ष कर उनसे अपने लिए जगह खाली नहीं करवाई?
बैल गाड़ी की जगह क्या रेलगाड़ी या अन्य विकसित वाहनों ने नहीं ले ली? क्या कालगेट पेस्ट ने दातुन को व्यवहार से बाहर नहीं किया? बबुल पेस्ट बबुल के स्वाद और अपनी परंपरा के प्रति आकर्षित तो करता है, लेकिन बबुल के इस्तेमाल की वकालत तो नहीं करता। बोलियों से समाजों को मुक्त करने की जिम्मेदारी हिंदी को नहीं लेनी चाहिए?
लेखक- मृत्युंजय



