दक्षिण भारत में बढ़ता हिन्दी प्रेम
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब तक भाषा की बात हुई तो इस पर एक अच्छा-खासा विवाद उठ खड़ा हुआ। दक्षिण भारतीयों ने प्रस्तावित हिन्दी एवं उर्दू का खुलकर विरोध किया। हिन्दवी एवं उर्दूवादियों के बीच भी इस बिन्दु पर तनातनी हो गयी। फलतः अंधेरे से निपटने के लिए सभा के सदस्यों को एक प्रकाशछिद्र दिखाई दिया। वह प्रकाश स्रोत था मतदान के जरिये राष्ट्रभाषा का चयन! आनन-फानन में मतदान सम्पन्न हो गया, हिन्दी क्रमशः उर्दू से एक मत आगे रही। दक्षिण भारतीयों के बीच तमिल, तेलगु, मलयालम एवं कन्नड़ में युद्ध जारी रहा! फिर भी हिन्दी के विरोधियों की जमात लम्बी-चौड़ी थी! खासकर इस मुद्दे के नेतृत्व का भार दक्षिण भारतीयों ने अपने कंधे पर उठा रखा था। विरोध के मद्देनजर हिन्दी को राजभाषा का स्थान मिला। अपने-आपको देवों की संस्कृति की भूमि का पुत्र कहते हुए हमें एक मामूली बात पर मुंहफुल्लौव्वल करना पड़ा।
हालिया कुछ बरसों में दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। सरकार की ओर से कई सुविधाएं भी मुहैया करायी गयी है। मद्रास के टी. नगर मुहल्ले में अवस्थित ‘हिन्दी प्रचारिणी सभा’ दक्षिण भारतीयों को हिन्दी के प्रति रिझाने के लिए लगभग चार दशकों से प्रयत्नशील थी जिसमें उसे हाल के कुछ वर्षों में निरन्तर सफलता का दर्शन हो रहा है। यह संस्था मद्रास से हिन्दी का टंकण मात्र सात रुपये में सिखाती है जबकि अंग्रेजी एवं तमिल के टंकण सिखाने हेतु प्रतिमाह 45-45 रुपये शुल्क के तौर पर लिया जाता है।
जुलाई 1992 में मेरी एक मुलाकात हिन्दी प्रचारिणी सभा, मद्रास के क्षेत्रीय निदेशक श्री बालासामी से उनके कार्यालय में हुई थी। इस भेंट में उन्होंने बताया कि अब हमारा प्रयास सार्थक होता जा रहा है। शुरुआती दौर में हम दूसरों के दरवाजों की कुंडिया खटखटाते रहते थे मगर हमारी बातें पूरी तरह सुनने के पहले ही लोग ‘इल्ले (नहीं)’ कहकर अपना दरवाजा बंद कर लेते थे। अब पढ़े-लिखे व्यक्तियों में हिन्दी का विरोध करने वाले बिरले ही हैं।
उन्होंने पुनः बताया कि “हमारे संस्थान गाँधी कन्वेन्शन हाल (गाँधी पदवीदान मंडप) से प्रतिवर्ष अच्छी-खासी संख्या में लोग हिन्दी की डिग्रियां हासिल कर रहे हैं। अच्छे-अच्छे कॉन्वेंट, कोचिंग, कालेज एवं निजी कम्पनियों की चिट्ठियां यह कन्फर्म करने के लिए भेजी जाती है कि अमुक व्यक्ति जिसने उस फर्म में नौकरी हेतु आवेदन किया है, फलां सेसन में क्या हिन्दी में ‘सचमुच’ डिग्री प्राप्त किया है। इससे आप स्वयं सोच सकते हैं कि हिन्दी कैसे अपना स्थान दक्षिण में बना रही है! बहुत से दक्षिण भारतीय हिन्दी साहित्य में अपना खास स्थान बना चुके हैं।
कई संस्थाएं हिन्दी के क्षेत्र में अहिन्दी भाषी मूल के विद्वानों को सेवा हेतु पुरस्कार प्रदान कर रही है जिससे उन लोगों का उत्साहवर्धन हुआ है। और हिन्दी तो कोई तोड़ने वाली भाषा का नाम नहीं है यह जोड़ने वाली भाषा है। तो आखिर लोग क्यों नहीं हिन्दी अपनायेंगे? मुरुगन अच्छे देवता हैं, कभी मार-काट नहीं किया तो दक्षिण में उनकी पूजा आज तक होती है तो भला यहाँ हिन्दी की पूजा क्यों नहीं होगी? मगर तीन घंटे के इस मुलाकात के अंत में उन्होंने हिन्दी की प्रगति के लिए यह चिंता व्यक्त की कि “अंग्रेजी का अत्यधिक प्रचलन हमारे लिए अच्छा सुकून नहीं है! जबकि संसार की कुल भाषाई आबादी में अंग्रेजी, चीनी एवं हिन्दी का स्थान क्रमशः पहला दूसरा एवं तीसरा है!
भारत से ज्यादा हिन्दी के प्रति रुझान रूस, अमरीका, जापान, पाकिस्तान, हंगरी, रोमानिया, काहिरा, बुल्गारिया, मॉरीशस एवं अन्य देशों में है। लंदन के हिन्दी पढ़ने वाले लोग हिन्दुस्तानियों से बड़े शौक से हिन्दी में बात कर आत्मगौरव महसूस करते हैं। यहाँ तक कि फिजी की सरकार अपनी सभी सूचनाएं हिन्दी में ही प्रकाशित करती है। जो हिन्दी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है। स्वतंत्र उजबेकिस्तान के निवासियों को भारत के सिने नायक राजकपूर बहुत पसंद हैं साथ ही इन लोगों ने ‘मेरा नाम जोकर’ तथा ‘संगम’ के सभी गानों को पंक्ति-बद्ध रट लिया है। और हम हैं कि हिन्दी से सौतेला व्यवहार करते हैं! हमें समझ आनी चाहिए।”
सही मायने में यदि विचार किया जाये तो दक्षिण भारत में हिन्दी जागरण को सफल बनाने में हिन्दी सिनेमा का बहुत बड़ा योगदान रहा है। प्रयोग एवं उच्चारण के तौर पर हिन्दी की सरलता ने वहाँ के भाषा-भाषियों को पोट लिया है! फलतः खड़ा रहने लायक स्थान मांगकर आज हिन्दी ने दक्षिण में अपनी चादर फैला ली है। लगभग दो दशकों के बीच हिन्दी ने वहाँ अपनी प्रतिष्ठा बना ली है। तभी तो अभिनेत्री रह चुकी राजनीतिज्ञ जयललिता, सुपर स्टार रजनीकांत, रेखा, कमल हसन, श्रीदेवी, मधु, नागार्जुन, मामूटी सरीखे कई कलाकार एवं गायन के क्षेत्र में कविता कृष्णमूर्ति, ए.पी.बालासुब्रह्मण्यम, हरिहरन एवं ए.आर.रहमान ने हिन्दी के कई नामी पुरस्कार अपनी झोली में डलवाकर हिन्दी भाषी क्षेत्रों की एकरसता पर कुठाराघात कर अहिन्दी भाषियों की हिन्दी में रूचि का नमूना पेश कर दिया है।
ऐसा नहीं है कि दक्षिण के लोग हिन्दी का विकास नहीं चाहते। वे इस विकास में अपना श्रम भी देना चाहते हैं। सही मायने में हिन्दी दक्षिण भारतीयों में महज एक भावना बनकर वास कर रही है जिसे, वोट लेने एवं सत्तासुख भोगने हेतु करुणानिधि जैसे हिन्दी विरोधी विचारधारा वाले नेताओं द्वारा विपत्तिकाल में भड़काया जाता रहा है।
खैर, जो भी हो हिन्दी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनवाने के लिए हमें उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम और आर्यों-अनार्यों का भेदभाव भुलाकर एक होना होगा। तभी हिन्दी के प्रति सच्ची श्रद्धा हम दिखा सकेंगे।



