4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

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सीखने-सिखाने का अनूठा मेला

कल्पना कीजिए एक ऐसे स्कूल की जिसमें खेल के मैदान के चारों ओर कक्षाएं लगी हैं। मैदान में पेड़-पौधे हों। हर तरफ रंगीन कागज की लड़ियां सजी हों और रंग-बिरंगे पोस्टर लगे हों। बच्चे ब्लैकबोर्ड के सामने फौजियों की तरह कतार में बैठने की जगह शिक्षकों के इर्द-गिर्द झुंड में जुटे हों। माहौल कुछ ऐसा हो कि बच्चे पढ़ने का और शिक्षक पढ़ाने का आनंद ले रहे हों। एक झलक में यह दूर की कौड़ी लगती है। चार-चार किलो के बस्ते पीठ पर लादकर पस्त कदमों से स्कूलों की ओर बढ़ते बच्चों के लिए तो ऐसी पाठशालाएं किसी परीकथा से कम नहीं हैं। लेकिन राजधानी दिल्ली के भारतीयम ग्राम में यह सपना उस समय साकार हो उठा जब राष्ट्रीय बाल मेले में हिस्सा लेने के लिए देश भर के 1,000 बच्चे और 250 से ज्यादा शिक्षक जमा हुए। मध्य प्रदेश के बैतूल से आईं आठवीं कक्षा की छात्रा शाहीन शेख कहती हैं ‘ऐसा मेला तो हर साल लगना चाहिए’।

इस मेले में आखिर ऐसा क्या था कि बच्चे यहां से वापस अपने घरों को लौटने की घोषणा से गमगीन हो गए। कुछेक की आंखों से तो आंसू तक छलक आए। दरअसल, बाल मेला एक स्कूल ही है। लेकिन इसमें और परंपरागत स्कूलों में फर्क है। मेला सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को उत्सव का माहौल दे देता है। यह ऐसा स्कूल है जहां विज्ञान की पढ़ाई दुस्वप्न नहीं, बल्कि मनोरंजन का स्रोत बन जाती है। जहाँ बच्चे शिक्षकों के नीरस भाषण सुनने के बजाय शिक्षण प्रक्रिया में सक्रिय हिस्सेदारी निभाते हैं। बाल मेला ‘पढ़ाते नहीं गुरुजी, पढ़ाती है छड़ी’ की आदिम मान्यता के धुर्रे उड़ा देता है। मेले में शरीक होने आए केरल के शिक्षक कृष्ण कुमार कहते हैं, ‘यह कक्षाओं में लोकतंत्र लाने की दिशा में एक कोशिश है।’

बच्चों में स्कूलों के प्रति रुचि जगाने के लिए भारतीय ज्ञान विज्ञान समिति और ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क ने ‘सीखने का मजा’ नाम से साल भर का एक कार्यक्रम तय किया है। इसके तहत ही गांव-ब्लॉक जिला और प्रखंड स्तर पर बाल मेले लगाए जा रहे हैं। इसी क्रम में दिल्ली में ‘सीखने का मजा’ कार्यक्रम का राष्ट्रीय बाल मेला लगा। इसमें देश के 250 जिलों से 500 बच्चे दिल्ली आए। इन बच्चों को दिल्ली के 500 मेजबान बच्चों के घरों में ठहराया गया। बच्चों को ठहराने की यह मेहमान-मेजबान प्रणाली पूरी तरह कामयाब रही। इसकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि तो यह रही कि बच्चों के अभिभावक भी इस तरह कार्यक्रम से वाकिफ हुए।

इस योजना के कारण मेले का आयोजन खर्च काफी घट गया। साथ ही, बच्चों को देश के दूर-दराज के इलाकों की संस्कृति और दूसरी विशिष्टताओं को जानने का मौका भी मिला। भाषा और खान-पान की भिन्नता से उत्पन्न समस्याओं को बच्चों ने अपने तरीके से हल किया। जाहिर है इस क्रम में उनमें राष्ट्रीय चेतना की जो भावना विकसित हुई होगी उसके लिए दर्जनों पाठ भी पर्याप्त नहीं होंगे। मिसाल के तौर पर, गुजरात से आए नौवीं कक्षा के छात्र आनंद दवे के मेजबान एस. गोपीनाथन, जो दिल्ली पुलिस पब्लिक स्कूल का छात्र है, के घर में मेला चलने के दौरान खास तौर पर शाकाहारी भोजन बनाया गया, क्योंकि आनंद शाकाहारी है। उसी तरह, बंगाल के अनिर्वाण पाल के लिए मदनगीर राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की सातवीं कक्षा के राजकुमार ने अपने घर में मछली-भात का प्रबंध करवाया।

बहरहाल, मेहमान-मेजबान की यह जोड़ी हर रोज सुबह साढ़े आठ बजे मेला स्थल पर जुट जाती। और फिर शुरू होता था खेल-खेल में पढ़ाई का सिलसिला। इसके लिए मेले में आठ केंद्र बनाए गए: रसोई घर के जरिए विज्ञान, कम खर्च वाले वैज्ञानिक प्रयोग, गणित-एक खेल, इतिहास सैर, हमारे शरीर, आओ नृत्य रचें और कागज के खेल। इन केंद्रों का आयोजन इस तरह किया गया जिससे सभी बच्चे सभी कॉर्नर्रों में हिस्सा ले सकें। यहां बच्चों ने विज्ञान कला और इतिहास की अवधारणाओं को गतिविधियों के माध्यम से सीखा।

इन केंद्रों में जानकारी की टोली भी होती थी, जो बच्चों की जिज्ञासाओं का जवाब देती। जानकारी की ऐसी ही एक टोली की सदस्या आशा कश्यप, जो दिल्ली की एक मोबाइल क्रंच में कार्यरत हैं, बताती हैं, ‘गणित को आम तौर पर नीरस विषय माना जाता है, मगर यहाँ बच्चों ने ऐसी शिकायत नहीं की।’ विज्ञान-सिखाने के लिए इन केंद्रों के अलावा बच्चों को विज्ञान यात्राओं पर भी ले जाया गया।

इसके तहत बच्चों की टोलियां घूमने के लिए विज्ञान संग्रहालय, प्लेनेटेरियम, रेल भवन संग्रहालय और मौसम विभाग गईं। इन संस्थानों के वैज्ञानिकों और दूसरे कर्मचारियों ने बच्चों के सवालों के जवाब दिए। इसके अलावा 20 नामीगिरामी वैज्ञानिक भी इस मेले से जुड़े रहे। इस मेले की एक खासियत थी ‘विज्ञान का खुला मंच’ जहाँ बच्चे वैज्ञानिकों से मनचाहा सवाल पूछते और उन पर खुली बातचीत करते। सीखने-सिखाने के इन अभिनव प्रयोगों से उत्साहित, राजधानी के लाजपत नगर नवयुग स्कूल की सातवीं की छात्रा मानसी सूरी कहती हैं, ‘हम ऐसी ही पढ़ाई चाहते हैं- सिर्फ यहाँ नहीं अपने स्कूलों में भी।’

हालाँकि यह मेला उसकी इस उम्मीद को साकार करने की दिशा में एक अहम कार्रवाई जरूर है लेकिन रोचक और आनंददायक शिक्षा का लक्ष्य अभी दूर है। ओड़िसा में सरकारी स्कूल के शिक्षक और काला हांडी के विज्ञान तरंग क्लब के संयोजक सपन कुमार गुहा के मुताबिक असली चुनौती बाल मेला के आदर्शों को स्कूलों तक ले जाने की है। वैसे उनका मानना है कि बाल मेला जैसे आयोजनों से शिक्षकों में यह चेतना बढ़ रही है कि शिक्षा को रोचक बनाना संभव है।

इस महोत्सव के प्रेरणा स्रोत और केरल शास्त्र साहित्य परिषद के प्रणेताओं में एक एम.पी. परमेश्वर स्वीकार करते हैं कि शिक्षा के पुराने जड़ ढांचे को उखाड़ पाना आसान नहीं है और न ही सहजता से किसी नई प्रणाली को कबूल किया जाएगा। लेकिन वे यह भी कहते हैं, ‘पढ़ाई को रोचक बनाए बगैर ‘सबके लिए शिक्षा’ का सपना साकार नहीं हो सकता।’ लिहाजा यह चुनौती सामूहिक है और जरूरी भी।

लेखक- दिलीप