4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

मेलों से बाहर भटकते पाठक

कम लोगों को मालूम होगा कि पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में भारत का दुनिया में आठवां स्थान है और तीसरी दुनिया में वह प्रकाशन के शिखर पर है. पर इस गौरव के अलावा हमारे पुस्तक-परिदृश्य का चप्पा-चप्पा अंधेरा है. इस अंधेरे की गहराई जानने के लिए हम सिर्फ यह जान लें तो काफी होगा कि हमारे यहां प्रति व्यक्ति प्रकाशित पृष्ठों (किताबों) की उपलब्धता का औसत क्या है.

दुनिया के अन्य बड़े प्रकाशक देशों में एक व्यक्ति को 2000 पृष्ठ पढ़ने को औसतन उपलब्ध है, हमारे यहां एक व्यक्ति को सिर्फ 30 पृष्ठ उपलब्ध है. हम यह जानकर गौरवान्वित हो सकते हैं कि अमेरिका और इंग्लैंड के बाद अंग्रेजी पुस्तकों के प्रकाशन में भारत नंबर तीन पर है, पर हम यह भी जानते हैं कि जनता के विशाल हिस्से की जरूरतों से इस अंग्रेजी प्रकाशन का कोई ताल्लुक नहीं. हमारे यहां कम से कम डेढ़ दर्जन भाषाएं हजारों साल का लिखित इतिहास रखती हैं. फिर भी छपनेवाली किताबें 50 फीसदी अंग्रेजी की होती हैं.

यह पुस्तक परिदृश्य हमारे सामाजिक परिदृश्य का प्रतिबिंब ही है. विश्व के कुल निरक्षरों का पचास प्रतिशत हमारे यहां ही है. एक साक्षर समाज के बिना एक पुस्तक-समाज की कल्पना संभव ही नहीं. सबको साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा हमारी सरकार ने बहुत पहले भुला दी है और रही-सही कसर नई शिक्षा नीति पूरी करने वाली है. ऐसे में समाज में पुस्तकों का क्या भविष्य होगा?

1982 में लंदन में यूनेस्को की तरफ से आयोजित विश्व पुस्तक कांग्रेस की ‘एक पाठक-समाज की ओर’ नामक विख्यात घोषणा में एक सपना देखा गया था कि हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जिसमें अधिक से अधिक लोगों को किताबें आसानी से उपलब्ध हों. किताबों को पढ़ने का आनंद समाज की जरूरत बन जाए. हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जिसमें सबको किताबें हों, सब उन्हें पढ़ सकें, सब उन्हें सम्मान दे सकें और जिस दुनिया में किताबें पढ़ना दैनिक कामना बन जाए, हम सिर्फ एक साक्षर दुनिया का नहीं, बल्कि एक विश्व-पाठक समाज का स्वप्न देखते हैं. जाहिर है कि भारत के संदर्भ में यह स्वप्न अभी शुद्ध स्वप्न है.

कुछ वर्ष पहले, राष्ट्रीय पुस्तक विकास परिषद ने राष्ट्रीय पुस्तक नीति पर विचार करने के लिए एक वर्किंग ग्रुप बनाया था. उसकी रिपोर्ट देश में पुस्तकों के मौजूदा परिदृश्य को घोर असंतोषजनक पाती है. चाहे प्रकाशन का क्षेत्र हो, पुस्तक वितरण का हो, या पुस्तकों की कीमत, उनके लेखन का क्षेत्र हो, रिपोर्ट हर स्तर पर अपना क्षोभ व्यक्त करती है. पर समस्या के असल मुकाम पर वहां भी उंगली नहीं रखी गई है.

इस शोचनीय पुस्तक परिदृश्य में सामाजिक विकास का नियम न करने वाली पूंजीखोर अर्थनीति तो सक्रिय है ही, शिक्षानीति और भाषानीति भी भयंकर भूमिका निभाती है. जिस देश की सत्तर फीसदी जनता की क्रय-शक्ति प्रतिदिन सिर्फ दो या ढाई रुपए हो, जिसे शिक्षा से पहले ही वंचित रखा गया हो, वहां किसी पुस्तक नीति की खोज करना सूखे में पोखर खोजना है. एक साक्षर समाज ही सच्चा पुस्तक समाज हो सकता है. पर जो एक तिहाई साक्षर समाज है, उसके लिए भी पुस्तकें नहीं हैं.

पाठ्य पुस्तकें इस एक तिहाई से कम समाज की प्राथमिक पुस्तकें होती हैं. किंतु वे हरेक शिक्षार्थी को उपलब्ध नहीं होतीं. नई शिक्षानीति खुद यह मानती है कि देश में लाखों स्कूल बिना छत, बिना ब्लैकबोर्ड और बिना टीचर के है. सिर्फ शहरी स्कूलों में पाठ्यपुस्तकें नजर आती हैं. इसमें भी प्राइवेट स्कूलों में अंग्रेजी पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता अधिक है. तकनीकी विषयों की तो बात ही छोड़िए, समाजशास्त्रीय विषयों पर मातृभाषाओं में पुस्तकें होती ही नहीं. अंग्रेजीपरस्त भाषानीति और पुस्तक उपलब्धता के इस अंतरंग में भारतीय भाषाओं के छात्र माध्यमिक शिक्षा के बाद ही पिछड़ने लगते हैं. मौजूदा पुस्तक-परिदृश्य का एक बड़ा नकारात्मक पहलू शिक्षा में अंग्रेजी का वर्चस्व है जो भाषाई प्रकाशन के विकास को रोक देता है.

आजादी मिलने के बाद सबको शिक्षा देने के नारे के साथ पुस्तकों के प्रकाशन की ओर भी ध्यान दिया गया था. हर राज्य में एक प्रादेशिक स्तर की ग्रंथ अकादमी और राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल बुक ट्रस्ट बनाई गई थी. इनका मकसद साहित्य का उत्पादन करना, उसे प्रोत्साहित करना और पुस्तकों को सस्ते में सुलभ कराना था.

1957 में बने नेशनल बुक ट्रस्ट ने शुरू से ही अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के पुस्तक मेले आयोजित किए और समय-समय पर पुस्तक प्रकाशन से संबंधित चुनौतियों पर लोगों का ध्यान खींचा, पर आज तक वह एक पुस्तक-संस्कृति को जन्म देने में नाकाम रहा है. पढ़ने की आदत विकसित करना, पुस्तक लेखन की स्थितियों को अनुकूल बनाना आदि ट्रस्ट के जिम्मे थे पर वे आज तक शुरू नहीं हुए. कारण वहां का बजट और ढांचा तमाम सरकारी नीतियों पर निर्भर रहा है और एक ऐसी नौकरशाही हावी रही है जो पुस्तकों की दुनिया और उससे जुड़े सवालों को समझने में अब तक असमर्थ

लेखक – सुधीश पचौरी