4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

हिन्दी के उत्थान में बिहार की भूमिका

उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध के दिन हिन्दी भाषा और इसके साहित्य-सृजन के लिए अत्यंत महत्व के थे। उस अवधि में एक प्रकार से चारो ओर उथल-पुथल मची थी। भारतवासियों के प्रति अंग्रेज शासकों के दमनात्मक रवैये और हर प्रकार के व्यवसाय में उनके फैलते पंजे ने देश में सांस्कृतिक क्रांति की आधारशिला रख दी थी और आहिस्ता-आहिस्ता एक नये सामाजिक जागरण की समां बंधने लगी थी। हिन्दी की उपयोगिता पूरे देश में सम्पर्क-सूत्र की तरह होने लगी और इसके संवर्द्धन के लिए अनेकानेक संस्थाएं जन्म लेने लगी। भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे हिन्दी-योद्धा के प्रयास से जिस समय काशी में ‘कवि समाज’ और ‘कविमंडल’ जैसी संस्था का गठन हुआ लगभग उसी समय यानी 1895-96 ईस्वी में लगभग आरा निवासी बाबू भगवती चरण और पटना स्थित बी.एन.कालेज के कुछ विद्यार्थियों के प्रयास से पटना में ‘कवि समाज’ की स्थापना की गयी। इसके सभापति बने पटना सिटी स्थित तख्त हरिमंदिर जी के प्रधान बाबा सुमेर सिंह जी।

इस ‘कवि समाज’ द्वारा ‘समस्यापूर्ति’ पत्रिका भी प्रकाशित की गयी जिसके संपादक सुप्रसिद्ध हिन्दीसेवी आरा निवासी बाबू ब्रजनंदन सहाय थे। पटना शहर में इसकी नियमित बैठकें होती थी, कभी बी.एन.कालेज भवन में, तो कभी बाकरगंज स्थित खड्गविलास प्रेस भवन में। सन् 1901 ईस्वी में आरा में पंडित सकल नारायण शर्मा के अथक प्रयासों से ‘आरा नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना हुई और लगभग इसी अवधि में मुजफ्फरपुर में ‘हिन्दी प्रचारिणी सभा’ बनी। पंडित भगवान प्रसाद चौबे जैसे समर्पित हिन्दी सेवी ने भागलपुर में हिन्दी सभा पुस्तकालय-वाचनालय भवन बनवाया, तो डाल्टनगंज में ‘हिन्दी अभ्युदय सभा’ हिन्दी के प्रचार-प्रसार में जुट गयी। गया में भी ‘हिन्दी सभा’ नामक संस्था थी जो वहाँ की प्राचीन पांडुलिपियों के संग्रहालय ‘मन्नूलाल लाइब्रेरी’ के साथ हिन्दी सेवा में लगी थी।

बिहार में इस युग में छोटे-छोटे रजवाड़े भी थे, जिनके दरबारों में हिन्दी काव्य और साहित्य की चर्चा होने के अलावा कवियों, लेखकों और हिन्दी-प्रेमियों को पुरस्कृत किया जाता था। ऐसे दरबारों में बनैली, दरभंगा, सूर्यपुरा, डुमरांव और गिद्धौर के दरबार बहुचर्चित थे। ‘भागलपुर हिन्दी सभा’ के प्रयास से अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का चौथा वार्षिक अधिवेशन भागलपुर में 1915 में आयोजित किया गया और फिर 1919 के नवंबर माह में पटना में बिहार प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने की। इस अधिवेशन में अनेक प्रसिद्ध हिन्दी सेवियों के साथ देशरत्न राजेंद्र प्रसाद ने भी भाग लिया। इस अवधि में मुजफ्फरपुर के जमींदार बाबू बैद्यनाथ प्रसाद सिंह, जो म्युनिसिपैलिटी के चेयरमैन भी थे, का नाम हिन्दी सेवा के लिए नहीं भुलाया जा सकता। वे हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने वाली हर संस्था की आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने के काम में लगे रहते और इस पर लगभग अपना सारा धन लुटा दिया।

उस समय बिहार के गाँवों, कस्बों और नगरों में हिन्दी को जन-जन के बीच प्रचारित करने के लिए समर्पित अनेकानेक छोटी-बड़ी संस्थाओं का जन्म हुआ और अपने स्तर से इन संस्थाओं ने हिन्दी के लिए जो कुछ किया वह अमूल्य था। इन्हीं संस्थाओं के सदपरिश्रम का ही परिणाम है कि हिन्दी आज एक ऊंचे धरातल पर खड़ी है और किसी भी समृद्ध भाषा की चुनौती स्वीकार करने में सक्षम है। इन संस्थाओं में चम्पारण के फुलवरिया का ‘सृजन हितैषी पुस्तकालय’ मुंगेर के खैरा का ‘सरस्वती पुस्तकालय’, छपरा का ‘शारदा नवयुवक समिति’, बिहार शरीफ का ‘बिहार हिन्दी पुस्तकालय’, गया की ‘हिन्दी साहित्य सभा’, हाजीपुर के पास लालगंज की ‘हिन्दी हितैषिणी सभा’, पूर्णिया के बरैठा का ‘मदनगोपाल पुस्तकालय’, मधुबनी का ‘युवक वाचनालय’, मुजफ्फरपुर का ‘सुहृद संघ’ आदि संस्थाओं के नाम हिन्दी सेवा के लिए उल्लेखनीय हैं। इसी समय पटना के कदमकुआँ में ‘हिन्दी साहित्य परिषद्’ काम कर रही थी जिसकी देखरेख पटना से प्रकाशित देश-प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक सर्चलाइट के व्यवस्थापक बाबू अम्बिका कांत सिंह करते थे।

इसी कार्यालय से संबद्ध ‘यूथ लीग’ थी जिसके सदस्य श्री रामवृक्ष बेनीपुरी और बाबू गंगा शरण सिंह जैसे उद्भट हिन्दी सेवी थे। इस परिषद् के तत्वावधान में उस समय गोष्ठियाँ, नाटकों के माध्यम से हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया जाता था और इनके द्वारा प्रस्तुत वृंदावन लीला की चर्चा काफी समय तक रही थी। सन् 1931 ईस्वी में बाबू अम्बिका कांत जी ने बी.एन. कॉलेज में एक वृहद अधिवेशन का आयोजन किया जिसकी अध्यक्षता महाकवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी ने की। इस अधिवेशन में अनेक पत्रकारों, लेखक, वकील, जज, सरकारी अफसर आदि के अलावा स्वनामधन्य लॉर्ड सच्चिदानंद सिन्हा भी शामिल हुए। लॉर्ड सिन्हा तो इस आयोजन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा-‘आज समझा कि हिन्दी में सामर्थ्य है, बल है, प्रभाव है और इसके द्वारा सब कुछ कहा जा सकता है।’ मुजफ्फरपुर में लगभग पंद्रह वर्षों तक बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का कार्यालय चलता रहा फिर 1936 में इसका प्रधान कार्यालय पटना लाया गया सम्मेलन ने अब तक आयोजित तेरह अधिवेशनों के जरिये हिन्दी के पक्ष में एक अद्भुत वातावरण का निर्माण कर दिया था।

अनेक अंग्रेजीदां लोग भी हिन्दी के पक्षधर होने लगे और सचिवालय तथा अन्य सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारी, अधिकारी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में योगदान करने लगे। बिहार के आदिवासी और संथाली क्षेत्रों में भी हिन्दी की जड़ें जमने लगीं और भूतपूर्व मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा तथा अन्य उत्साही लोगों के सदप्रयास से देवघर में ‘हिन्दी विद्यापीठ’ की स्थापना की गयी जो आज भी सफलतापूर्वक चल रही है। इस विद्यापीठ के तत्वावधान में संथाल परगना क्षेत्र में हिन्दी के सघन प्रचार-प्रसार का एक व्यापक कार्यक्रम उस समय चलाया गया जिसके अपेक्षित परिणाम सामने आये। विद्यापीठ के संथाल परगना के ग्रामीण इलाकों में अनेक हिन्दी पाठशालाएं खोली गयीं जहाँ संथाली के साथ-साथ हिन्दी पढ़ायी जाने लगी। बिहार प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने तो संथाल परगना क्षेत्र में हिन्दी के प्रचार के लिए एक अलग समिति का ही गठन कर दिया जिसके प्रभारी पंडित बुद्धिनाथ झा ‘कैरव’ बनाये गये। कालांतर में देवघर का हिन्दी विद्यापीठ एक प्रकार से पूर्वी भारत का एक प्रमुख हिन्दी केंद्र बन गया और बाबू राजेंद्र प्रसाद आजीवन इसके कुलाधिपति बने रहे।

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्यालय के पटना आ जाने के बाद एक प्रकार से हिन्दी के एक नये युग का प्रारंभ हुआ। अंग्रेजी दैनिक सर्चलाइट के मैनेजर और अनन्य हिन्दी प्रेमी पंडित छविनाथ पांडेय को इसका प्रधान बनाया गया और उसके बाद तो सम्मेलन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पांडेय जी को हिन्दी पुस्तकों के संग्रह का व्यसन था और यह उनके परिश्रम और सतत् प्रयास का ही परिणाम था कि सम्मेलन के पुस्तकालय में दुर्लभ हिन्दी पुस्तक संग्रहीत की जा सकी। राजेंद्र बाबू के व्यक्तिगत संग्रह की लगभग चार सौ पुस्तकें भी इनके प्रयास से सम्मेलन पुस्तकालय में लायी गयीं। किंतु 1942 के आंदोलन की धर-पकड़ जारी थी। पांडेय जी भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिये गये और उनके बाद सम्मेलन पुस्तकालय से इन पुस्तकों के गायब होने का सिलसिला चल पड़ा।

उन्नीसवीं शती के प्रारंभ में और उसके बाद भी सरकारी कार्यालयों और कचहरियों आदि में फारसी या उर्दू लिपि चलती थी। इसके स्थान पर नागरी लिपि को प्रतिष्ठित करने के लिए बिहार में अनेक हिन्दी प्रेमियों ने नानाविध कार्य किये। मुजफ्फरपुर के श्री अयोध्या प्रसाद खत्री और बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी श्री भूदेव मुखर्जी ने इस दिशा में बहुत कुछ किया और 1881 में बिहार में नागरी लिपि के वैकल्पिक प्रयोग की अनुमति मिल गयी। हिन्दी भाषा को परिमार्जित करने की दिशा में भी बिहार में उल्लेखनीय कार्य किये गये। सन् 1855 ई. में बिहार के पंडित श्रीलाल लाल का हिन्दी व्याकरण संबंधी पुस्तक ‘भाषा चंद्रोदय’ का प्रकाशन हुआ जिसमें हिन्दी भाषा के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया।

बिहार के हिन्दी प्रेमियों ने हिन्दी को एक सुदृढ़ आधार देने और संप्रेषणीयता की दृष्टि से उसे सबल और सक्षम बनाने की दिशा में जो प्रयास किये वस्तुतः मील के पत्थर सिद्ध हुए हैं और सम्पूर्ण हिन्दी जगत बिहारवासियों के सदप्रयासों को सादर स्वीकारता है।

लेखक – डॉ. महेश कुमार सिन्हा