4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

सभी भारतीय भाषाओं के प्रकाशक आगे बढ़ें!

देश में आज अराजकता की जो पराकाष्ठा है उससे व्यावसायिक क्षेत्र भी अछूता नहीं रह सकता और प्रकाशन व्यवसाय तो बुरी तरह प्रभावित है। पिछले कई वर्षों में देश की सरकार- चाहे वह कांग्रेस-ई की रही हो, राष्ट्रीय मोर्चे या समाजवादी जनता पार्टी की, केवल सत्ता हथियाने और मत एकत्र करने की राजनीति में जुटी रही है। देश में भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा को दूर करने की जरूरत ही महसूस नहीं की गई। शिक्षा नीति बनी, पुस्तक नीति बनी पर सब कागजी कार्यवाही रही।

अरबो रुपया पुस्तकों की खरीद में लगाया गया पर उससे पुस्तक व्यवसाय की नींव मजबूत होने के बजाय खोखली ही हुई। भ्रष्टाचार का जहर राजनीति तक सीमित न रहकर प्रशासन और प्रकाशक की जड़ों तक पहुँच गया है जिससे पुस्तक-संस्कृति का वह वटवृक्ष जिसने समूचे विश्व को ज्ञान और विज्ञान की छाया दी, जर्जर होता नजर आ रहा है।

कहा जाता है कि पुस्तकों की अंधाधुंध बढ़ती कीमतों के कारण पुस्तकें पाठक से दूर चली गई हैं, पर वास्तविकता यह है कि पाठक आधुनिकता की अंधी दौड़ में पुस्तकों को भुला बैठा है। महंगाई तो सब ओर बढ़ी है, आवश्यकता की हर वस्तु महंगी हो गई है, पर असल बात है कि जीवन की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। पुस्तक, जो इंसान की सबसे अच्छी दोस्त है, हर परिस्थिति में मार्गदर्शक का काम करती है, आज एक गैर जरूरी चीज बनकर रह गई है। स्कूलों में पाठ्यक्रम की आवश्यक पुस्तक पढ़ना विद्यार्थी के लिए एक विवशता है, पर कॉलेज में जाकर तो वह भी समाप्त हो जाती है।

पूरे वर्ष न अध्यापक पढ़ाने की जरूरत समझते हैं न विद्यार्थी पढ़ने की। परीक्षा नजदीक आने पर “संभावित प्रश्न पत्र” (Guess papers) उत्तर सहित उपलब्ध हो जाते हैं और विद्यार्थी उन्हीं से परीक्षा देकर अपनी शिक्षा की इतिश्री समझ लेता है। पुस्तक नहीं बिकती-बिकती है- व्यावसायिक अध्यापकों और प्रकाशकों की मिली जुली “कला” या चातुर्य। गनीमत है कि उच्च शिक्षा या प्रोफेशनल शिक्षा के लिए अभी भी विद्यार्थियों को अध्ययन करना पड़ता है- पर जिस प्रकार हाल ही में भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा का प्रश्न पत्र परीक्षा से पहले ही प्रसारित हो गया तो कहा जा सकता है कि आगे डॉक्टरों, इंजीनियरों या मैनेजमेंट की परीक्षा के लिए विद्यार्थियों को पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।

महंगाई बढ़ने के साथ-साथ अनैतिकता और स्वार्थ की वृद्धि ने डाक व्यवस्था, रेल व्यवस्था जैसी सार्वजनिक सेवाओं को जनता से, व्यवसायियों से दूर कर दिया है। एक सामान्य प्रकाशक का अधिक समय अच्छी पुस्तक के प्रकाशन में नहीं इन सेवाओं के साथ जूझने में चला जाता है।

कागज के मूल्य लगातार बढ़ते रहे हैं और उस पर भी चुनाव के बाद चुनाव से स्थिति बद से बदतर हो जाती है। एक अच्छे ग्रन्थ का प्रकाशन केवल सपना बनकर रह जाता है। आज पुस्तक की उपेक्षा, प्रकाशक की कठिनाई और लेखक की निराशा से देश की व्यवस्था का कोई सरोकार नहीं है।

इन विषम परिस्थितियों से निपटते हुए प्रकाशन व्यवसाय की उन्नति के लिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि भारत के सभी प्रकाशक चाहे वह किसी भी भाषा में पुस्तकों का प्रकाशन करते हों, एक जुट होकर संकल्प लें कि पुस्तक रूपी दीपक के प्रकाश से राष्ट्र के गौरव को प्रकाशित करते रहेंगे। इस दिशा में फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स का यह प्रयास सराहनीय है कि सभी भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों को एक मंच पर लाकर समान गौरव का भागीदार बनाया गया है। इससे सभी भारतीय भाषाओं के प्रकाशक लाभ उठायें। इससे न केवल विचारों का आदान-प्रदान बढ़ेगा वरन् एक भाषा की अच्छी पुस्तकों का दूसरी भाषा में अनुवाद के लिए इसका उपयोग होगा और भारतीय प्रकाशन व्यवसाय को समृद्ध बनाएगा।

लेखक- आशा रानी